30. सिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) विधेयक - Page 284

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पारित करने का अधिकार दिया गया है, पारित आदेश की वैधता से जुड़े प्रत्येक छोटे से छोटे मामले को उच्च न्यायालय में भेजा जाए। इससे उच्च न्यायालय में भेजे जाने वाले मामलों की संख्या में अनावश्यक रूप से वृद्धि होगी। इस विधेयक में अत्यधिक महत्व के निम्न तीन प्रकार के मामलों को सम्मिलित करने का प्रस्ताव हैः ( i ) केन्द्रीय विधायिका के अधिनियम अथवा राज्य विधानमंडल के अधिनियम, एवम् ( ii ) विधानमंडल के अधिनियमों के आधार पर मान्य अध्यादेश और ( iii ) विनियम/प्रत्येक विनियम नहीं, बल्कि बंगाल, बाम्बे और मद्रास में पारित अथवा 1897 के साधारण

खंड अधिनियम में परिभाषित विनियम। ये विनियम पुराने हैं, जो विधानमंडलों की स्थापना से पहले प्रख्यापति किए गए थे परन्तु ये संविधि पुस्तक में रखे गए हैं। अतः वे उसी बल के साथ लागू होते हैं और उसी आधार पर हैं जिस पर अधिनियम और अध्यादेश आधारित हैं, उदाहरणार्थ, 1818 का विनियम III अतः यह विधेयक केवल उन्हीं मामलों में लागू होगा जिनमें विधानमंडल के अधिनियम की वैधता सम्बद्ध है और यह कलक्टर अथवा सरकार के सचिव अथवा किसी अन्य अधिकारी द्वारा जिसे शक्ति प्रत्यायोजित की गई है, पारित आदेश की वैधता पर लागू नहीं होगा। ये ठीक ही विधेयक की परिधि में नहीं आते।

महोदय, मैं समझता हूँ कि यह हितकारी उपबंध है और यह विधेयक यथावत् पारित किया जाना चाहिए।

डॉ. अम्बेडकरः मुझे कृपया मेरे माननीय मित्र डॉ. टेक चन्द की टिप्पणियों को अंगीकार करने की अनुमति दी जाए क्योंकि यहां जो कुछ कहा जा चुका है उसके अतिरिक्त मुझे जो कुछ कहना है वह बहुत कम है एवम् उसके लिए समय भी बहुत कम है। हमने इन प्रश्नों पर चर्चा की थी एवम् उन्होंने अब वही कहा है जो यदि मुझे अवसर मिलता तो मैं भी वही कहता। मैं समझता हूँ कि वह पर्याप्त होगा। यदि इस तरह के संशोधन अथवा ऐसे मामलों से कोई बिन्दु उठता है तो मैं उनसे अवश्य निपटूंगा।

माननीय अध्यक्षः प्रश्न है।

फ्कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 एवम् दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 का और आगे संशोधन करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्

प्रस्ताव अंगीकार किया गया।

खंड 2 (1908 के अधिनियम V का संशोधन)

श्री शिवचरण लालः मैं इस खंड में एक संशोधन चाहता हूं। यदि माननीय विधि मंत्री इसे स्वीकार करने के इच्छुक हैं तो मैं इसे रखूं। अन्यथा मैं इसे नहीं रखूंगा।