270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
डॉ. अम्बेडकरः नहीं, इसे स्वीकार करने की मंशा नहीं है।
श्री के. वैद्यः महोदय, आदेश XLVI के नियम-2 और इसी आदेश के नियम-5 असंगत प्रतीत होते हैं और मैं चाहता हूं कि माननीय विधि मंत्री स्थिति को स्पष्ट करें, मैं सूची संख्या 3 के अपने संशोधन संख्या 2 और 3 का हवाला दे रहा हूँ। मैं संशोधन संख्या 1 को नहीं रख रहा हूँ। मैं इस बिन्दु को पहले भी उठा चुका हूँ और मैं जानना चाहता हूँ कि माननीय विधि मंत्री क्या कहना चाहते हैं।
डॉ. अम्बेडकरः मैं अपने माननीय मित्र द्वारा प्रस्तावित संशोधनों को स्वीकार करने को तैयार नहीं हूँ क्योंकि मैं नहीं समझता कि यह उचित एवम् उपयुक्त है कि किसी एक मामले में सभी कार्यवहियाँ रोक दी जाएं।
माननीय अध्यक्षः किन्तु श्री वैद्य अपने संशोधन संख्या 1 को नहीं रख रहे हैं।
4.00 बजे अपरा“न
डॉ. अम्बेडकरः जी हाँ, किन्तु जिन संशोधनों का इन्होंने हवाला दिया है वे उनके संशोधन संख्या 1 का परिणाम हैं अतः यदि यह नहीं रखा जाता है तो अन्य संशोधनों में कोई दम नहीं है।
श्री के. वैद्यः ये पारिमाणिक नहीं हैं क्योंकि...........
माननीय अध्यक्षः पहले उन्हें स्थिति स्पष्ट करने दें।
डॉ. अम्बेडकरः जैसा कि मैंने इसे समझा है, स्थिति इस प्रकार है। सुझाव है कि जब अधीनस्थ न्यायालय द्वारा उच्च न्यायालय को निर्देश भेजा जाए तो उस मामले में कार्यवाहियां स्थगित होनी चाहिएं। यह माननीय सदस्य का मूल मुद्दा है। उस न्यायालय को तब तक कोई कार्रवाही नहीं करनी चाहिए जब तक कि उच्च न्यायालय अपने निर्वचन सहित कागजात न लौटाए। इस स्थिति से मैं इस कारण से पूर्णतः अहसमत हूं कि एक मामला सांविधानिक प्रकृति के एक मुद्दे से जुड़ा हो सकता है और अन्य मुद्दों का संविधान से कोई संबंध नहीं हो सकता। मैं नहीं समझ पाया कि मजिस्ट्रेट उस विधेयक के अन्तर्गत मामले से जुड़े एक मुद्दे को उच्च न्यायालय को भेज देता है तो अन्य मुद्दों को कार्यवाही से वंचित क्यों रखा जाना चाहिए। अतः मैं उनके पहले संशोधन को स्वीकार करने को तैयार नहीं हूं जिसके द्वारा वे चाहते हैंः
फ्कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 113 के प्रस्ताविक परंतुक में खंड 2, के भाग ( i ) मेंय् उक्त मामले में आगे की कार्यवाहियां रोक दी जाएं शब्दों को अन्त में जोड़ा जाए।