30. सिविल प्रक्रिया संहिता (संशोधन) विधेयक - Page 286

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श्री के. वैद्यः मैं अनुरोध करता हूं कि वे उनमें से शेष विशुद्ध रूप से पारिपामिक हैं। परिणामिक नहीं हैं क्योंकि आदेश XLVI का नियम 2 तथा आदेश XLVI का नियम 5 उन मामलों से संबंधित है जिनमें निर्णय दिए जाते हैं एवं उस मामले में जिसमें मुद्दे को उच्च न्यायालय में भेजा गया है, निर्णय नहीं दिया जाएगा। आदेश XX के नियम 4 के अन्तर्गत इस मुद्दे पर निर्णय किया जाना चाहिए और तब भी निर्णय लिया जा सकता है एवं आदेश XLVI के नियम 2 उन मामलों को निर्दिष्ट करता है जिनमें निर्णय दिया जाता है। अतः ये दोनों नियम इस विधेयक के लिए असंगत या उसे लागू नहीं होते हैं।

डॉ. अम्बेडकरः मैं बताना चाहूंगा कि इसे अधीनस्थ न्यायाधीश के विवेकाधिकार पर छोड़ दिया गया है। वह कार्यवाहियां रोकने के आदेश दे सकता है अथवा नहीं दे सकता है। मेरे माननीय मित्र चाहते हैं कि अधीनस्थ न्यायाधीश के विवेकाधिकार को समाप्त कर देना चाहिए एवं सभी मामलों में उसे कार्यवाहियां रोकने के आदेश देने चाहिए। अतः मैं उनके संशोधन को स्वीकार नहीं कर रहा हूं।

माननीय अध्यक्षः क्या माननीय सदस्य अपना संशोधन रखना चाहते हैं?

श्री के. वैद्यः जी नहीं।

माननीय अध्यक्षः मैं खंड 2 को मतदान के लिए रखता हूँ।

प्रश्न हैः

फ्कि खंड 2 इस विधेयक का भाग बन गया है।य्

खंड 2 को विधेयक में जोड़ा गया।

खंड 3-नई धारा को प्रतिस्थापित करनाः संशोधन किया गया।

फ्उक्त संहिताय् शब्दों के लिए खंड 3 में फ्दंड प्रक्रिया संहिता, 1898य् शब्दों और आंकड़ों को प्रतिस्थापित किया जाए।

µ(डॉ. अम्बेडकर)

श्री शिवचरण लालः जहाँ तक सिविल प्रकिया संहिता का संबंध है, आदेश का अधिक महत्ता नहीं है। किन्तु जहां तक दंड प्रक्रिया संहिता का संबंध है, आदेश भी अधिनियम की तरह प्रभावी होते हैं। मैं बताना चाहता हूं कि भारत रक्षा अधिनियम के अन्तर्गत विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अनेक आदेश पारित किए गए थे और ये आदेश कानून के समान थे। अतः यदि आप ‘अधिनियम, अध्यादेश एवं विनियम’ शब्दों को