276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पाएगा। इसी तरह हमारी सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 13 बताती हैः
फ्कोई विदेशी निर्णय किसी मामले के संबंध में निर्णायक माना जाएगा, जिसके द्वारा उन्हीं पक्षकारों के बीच अथवा उन पक्षकारों के बीच जिनके अधीन वे अथवा उनमें से कोई, उसी शीर्षक के अन्तर्गत मुकदमा लड़ता है_ प्रत्यक्षतः न्यायनिर्णय हो जाता है,µसिवाय वहां केµ
(क) फ्जहाँ वह सक्षम न्यायाधिकार के न्यायालय द्वारा घोषित नहीं किया गया हो_य्
अधिकारिता का प्रश्न हमेशा मूलभूत होता है। यह कभी नहीं रुक सकता। यह सामित किया जाना चाहिए कि जिस न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया गया है उसे डिक्री देने की अधिकारिता थी।
श्री सिधवाः यह बिल्कुल सही है।
डॉ. अम्बेडकरः क्या सही है? यदि आप अधीनस्थ न्यायालय में जाते हैं और उसकी अधिकारिता के बाहर निर्णय प्राप्त करते हैं। तो कोई भी इसे निष्पादित नहीं कर सकता क्योंकि यह विधिमान्य नहीं है।
माननीय अध्यक्षः प्रश्न हैः
फ्कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 का और आगे संशोधन करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्
प्रस्ताव अंगीकार किया गया।
खंड 2 विधेयक में जोड़ा गया।
खंड 1 विधेयक में जोड़ा गया।
यह शीर्षक और अधिनियम सूत्र विधेयक में जोड़े गए।
डॉ. अम्बेडकरः मैं प्रस्ताव रखने की अनुमति चाहता हूँः
फ्कि विधेयक पारित किया जाए।य्
माननीय अध्यक्षः प्रश्न है कि विधेयक पारित किया जाए।
प्रस्ताव अंगीकार किया गया।