33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 303

288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ऽमाननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः कल चर्चा के दौरान, मेरे मित्र पं. हृदय नाथ कुंजरु ने कहा था कि सरकार ने इस विधेयक में विभिन्न खण्डों की आवश्यकता और उद्देश्य स्पष्ट ने करके सदन के साथ घोर अन्याय किया है, और सरकार की ओर से किसी को उन्होंने विशेषरूप से मेरा उल्लेख किया, सदन के प्रति उस कर्त्तव्य का निर्वाह करने के लिए खड़ा होना चाहिये था। मैं नहीं समझता कि इस सदन का कोई सदस्य इस बात पर विश्वास करेगा कि पं. हृदय नाथ कुंजरु जैसी प्रतिभा वाले किसी व्यक्ति को इस विधेयक की व्याख्या की आवश्यकता पड़ेगी। जाहिर है कि मेरे मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को विधेयक की किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं पड़ी। प्रधान मंत्री का भाषण समाप्त होते ही वे उठ खड़े हुए और उन्होंने अपना जोरदार भाषण आरंभ कर दिया। मैं नहीं समझता कि मेरे मित्र पं. कुंजरु बुद्धि में डॉ. मुखर्जी से किसी तरह कम हैं। तथपि, चूंकि, पं. कुंजरु ने इस सदन के कई सदस्यों की इच्छा व्यक्त की थी, मैंने इस चर्चा के बीच में भाग लेना और स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक समझा ताकि चर्चा के दौरान जिन दो तर्कों का उल्लेख किया गया है उनका निवारण किया जा सके। ये तर्क थे कि संविधान का संशोधन करने की आवश्यकता नहीं थी दूसरे, सरकार को इन्तजार करना चाहिये था और देश को तथा लोगों को और अधिक समय देना चाहिये था तथा इस विधेयक को पारित करने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये थी। मैं विधेयक को खण्डवार लूंगा और उन परिवर्तनों की आवश्यकता स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा जो इस विधेयक के माध्यम से किए जा रहे हैं।

मैं विधेयक के खण्ड 2 से आरम्भ करता हूँ। खण्ड 2 में अनुच्छेद 15 का संशोधन करने का प्रस्ताव है। अनुच्छेद 15 का संशोधन करने की आवश्यकता उच्चतम न्यायालय द्वारा, दो मामलों में, जो मद्रास राज्य से इसके पास भेजे गये थे, दिये गये फैसलों के कारण उत्पन्न हुई है। एक मामला मद्रास बनाम श्रीमती चम्पकम दोराईराजन का था और दूसरा वेंकटरमन बनाम मद्रास राज्य का। वेंकटरमन का मामला अनुच्छेद 16, खंड (4) से सम्बन्धित था और श्रीमती चम्पकम का अनुच्छेद 29, खंड (2) से। एक मामले में लोक सेवाओं में पिछड़ी जातियों के आरक्षण का प्रश्न अन्तर्ग्रस्त था और दूसरे में शैक्षणिक संस्थाओं में पिछड़े वर्गों के आरक्षण का। बाद में मद्रास प्रेसीडेंसी में और अन्यत्र भी इस साम्प्रदायिक सरकारी आदेश के नाम से जाना गया। मद्रास सरकार के साम्प्रदायिक सरकारी आदेश को अवैध और अमान्य घोषित किया गया, क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 29 के खंड (2) में बचाव की वह व्यवस्था नहीं है, जो अनुच्छेद 16 के खंड (4) में है। सदन को याद होगा कि अनुच्छेद 16 के खंड (4) में एक विशेष व्यवस्था की गई है कि अनुच्छेद 16 सरकार द्वारा सेवाओं में पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व

ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 18 मई, 1951, पृष्ठ 9004-12