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सम्बन्धी उपयुक्त व्यवस्था करने के आड़े नहीं आयेगा। ऐसी व्यवस्था अनुच्छेद 29 में नहीं है। अनुच्छेद 16 के खंड (4) के संबंध में उच्चतम न्यायालय का मानना था कि इसमें जातिगत भेदभाव अंतनिर्हित है, अतः वह अमान्य है। मैंने उच्चतम न्यायालय के इन दोनों निर्णयों को खूब ध्यान से पढ़ा है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के प्रति पूरे आदर के साथ मैं यह कहने पर विवश हूँ कि यह निर्णय एकदम असन्तोषजनक है।
श्री नजीरुद्दीन अहमद (पश्चिम बंगाल)ः महोदय, मेरा एक व्यवस्था का प्रश्न है। क्या किसी सदस्य के लिए देश के उच्चतम न्यायालय के प्रति अनादर प्रकट करना उचित है? संसद में यह प्रथा है कि यहां न्यायालयों के लिए तिरस्कारपूर्ण शब्दों का प्रयोग न किया जाए।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः विद्वान न्यायधीशों की कोई अवमानना नहीं की गई है।
माननीय अध्यक्षः मैंने स्वयं महसूस किया कि ऐसे शब्द का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये था। परन्तु मेरे विचार में माननीय विधि मंत्री का आशय यह था कि सरकार जो करना चाहती है, उसे ध्यान में रखते हुए निर्णय असन्तोषजनक है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः निर्णय संविधान के अनुच्छेदों के अनुरूप नहीं लगता। यह मेरा विचार है।
माननीय अध्यक्षः मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ा रहा है कि माननीय मंत्री के लिए उच्चतम न्यायालय के किसी भी निर्णय की इतनी कटु आलोचना करना उचित नहीं होगा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मुझे अत्यंत खेद है।
माननीय अध्यक्षः मैं यह सोच रहा था कि उन्होंने जो कहा है उसका कोई भिन्न अर्थ न लगाया जाये। अर्थात् यही अर्थ लगाया जाये कि सरकार जो करना चाहती है, उसे ध्यान में रखते हुए निर्णय असन्तोषजनक है।
श्री राजगोपालाचारी (गृह मंत्री)ः माननीय अध्यक्ष मेरे हस्तक्षेप को क्षमा करें। मेरे विचार में माननीय विधि मंत्री वास्तव में यह कहना चाहते थे कि निर्णय के कारण एक सन्देह उत्पन्न हो गया है।
माननीय अध्यक्षः अब आगे बढ़ें।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरा विचार यह है कि अनुच्छेद 29 के खंड (2) में, सबसे अधिक महत्वपूर्ण शब्द है, ‘केवल’। केवल जाति, धर्म अथवा लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं बरता जायेगा। वहां ‘केवल’ शब्द बहुत महत्वपूर्ण है।