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गया है, उस पर हम नियंत्रण न कर सकें और यह इतना असीमित हो जाये कि कोई भी व्यक्ति हत्या अथवा किसी अन्य संज्ञेप अपराध के किये जाने के लिए लोगों को भड़काता फिरे। मैंने इस मामले को संक्षेप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। यही स्थिति है।
यही बात सार्वजनिक सुरक्षा कानूनों अथवा सावर्जनिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए विभिन्न राज्यों द्वारा बनाये गये कानूनों के संबंध में हुई है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने उसके संबंध में भी यही कहा है कि उन पर भी संविधान की ओर से कोई पाबन्दी नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने के बीच अन्तर किया है। उसका कहना है कि संसद राज्य की सुरक्षा के लिए कानून बना सकती है। परन्तु वह सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने के संबंध में कोई कानून नहीं बना सकती। इस पर भी मैं चाहूंगा कि सदन गम्भीरता से विचार करे। क्या सदन वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को इतना निरंकुश बनाने के लिए तैयार है कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी कहकर बच सकता है, भले ही उसके इस प्रकार कहने से सार्वजनिक गड़बड़ी पैदा हो जाए? यदि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के फैसले ज्यों के त्यों बने रहें, तो इसका परिणाम यही होगा कि हम कभी ऐसा कानून नहीं बना सकेंगे जो सार्वजनिक व्यवस्था के हित में वाक् स्वतंत्रय पर रोक लगाए और हिंसा भड़काये जाने पर प्रतिबंध लगाए। मेरे मित्र डॉ. मुखर्जी विपक्ष के नेता की भूमिका बखूबी निभा रहे हैं और अपने दल के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए उनका काम हर बात का विरोध करना है। मैं चाहता हूँ कि वह इस बात पर विचार करें कि उच्चतम न्यायालय और प्रांतीय उच्च न्यायालयों के निर्णयों के हमारे विधान में जो शून्य पैदा कर दिया है क्या उसे वाक्-स्वातंत्र्य के नाम पर बने रहने दिया जाए। यह एक सीधा-सादा प्रश्न है। मुझे विश्वास है कि यदि मेरे मित्र डॉ. मुखर्जी मेरे द्वारा वहां की गई टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के विभिन्न निर्णयों का अध्ययन करेंगे, तो वह निस्संदेह इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि यह एक ऐसी स्थिति है जिसे अवश्य सुधारा जाना चाहिये और इसे यथावत कायम नहीं रहने दिया जाना चाहिये।
पं. ठाकुर दास गुप्ता (पंजाब)ः वह चाहते हैं कि इस प्रयोजन के लिए नजरबंदी कानूनों का प्रयोग किया जाए।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नजरबंदी कानून सर्वथा भिन्न है। यह संक्षेप में संविधान के अनुच्छेद 19 के संशोधन का मामला है।
यह विचार करना महत्वपूर्ण है कि उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर क्यों पहुंचे। वे यह क्यों कहते हैं कि सार्वजनिक व्यवस्था के हित में अथवा अपराध करने के लिए उकसाने को रोकने के हित में कानून बनाने का संसद को कोई अधिकार नहीं है? यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है, जिसको लेकर मैं