33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 310

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प्रत्येक राज्य को वह प्राप्त है जिसे अमरीका में फ्पुलिस शक्तिय् कहते हैं। इस सिद्धांत का आशय यह है कि राज्य को अपनी रक्षा करने का अधिकार है, भले ही संविधान ने उसे यह अधिकार स्पष्ट रूप से न दिया हो। फ्पुलिस शक्तिय् उसी प्रकार सहज रूप से निहित है, जिस प्रकार किन्हीं परिस्थितियों में हमारे न्यायालयों को न्याय करने की सहज शक्तियां प्राप्त हैं। फ्पुलिस शक्तिय् के इस सिद्धांत के परिणामस्वरूप अमरीकी उच्चतम न्यायालय अमरीकी नागरिकों के मूल अधिकारों पर कतिपय सीमाएं निर्धारित कर सका है। इसका सिद्धान्त जिसका अमरीकी उच्चतम न्यायालय ने विकास किया और जिसका हमने संविधान की व्याख्या करने के प्रयोजनार्थ प्रयोग किया, ‘अन्तर्निहित शक्तियों’ का सिद्धांत कहलाता है। उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के अनुसार, यदि किसी प्राधिकारी को कोई शक्ति दी गई है, तो यह मानना होगा कि उस प्राधिकारी को उस शक्ति के प्रयोग में सहायक अन्य शक्तियां भी दी गई हैं। और यदि ये शक्तियां प्रकट रूप से नहीं दी जाती हैं, तो अमरीकी उच्चतम न्यायालय यह मानने के लिए तैयार है कि ये शक्तियां संविधान में विवक्षित हैं।

अब, प्रश्न यह उठता है कि हमारे देश में उच्चतम न्यायालय में संविधान की व्याख्या करने के मामले में क्या दृष्टिकोण अपनाया है? उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वह फ्पुलिस शक्तिय् के सिद्धांत को, जो अमरीका में प्रचलित है, मान्यता प्रदान नहीं करेगा। मैं उच्चतम न्यायालय के निर्णयों को पढ़कर सदन का समय बरबाद नहीं करूंगा किन्तु जो उन्हें देखने के उत्सुक हैं वे चिरंजीव लाल चौधरी बनाम भारत संघ के मामले को, जो शोलापुर मिल्स के मामले के नाम से प्रसिद्ध है, देखें। मि. जस्टिस मुखर्जी ने स्पष्ट रूप से इस सिद्धांत को अस्वीकार किया है। उनका कहना है कि वे इस सिद्धान्त को लागू नहीं करेंगे। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश का फ्पुलिस शक्तिय् के सिद्धांत को न अपनाने का कारण, जहां तक मैं समझता हूँ यह है कि संविधान ने खंड (2) में शीर्षों का विशेष रूप से उल्लेख किया है, जिसके अन्तर्गत संसद वाक् स्वातंत्र्य संबंधी मूल अधिकार पर प्रतिबंध लगा सकती है और क्योंकि संसद ने उन शीर्षों को स्पष्टतः निर्धारित किया है जिनके अन्तर्गत ये पाबन्दियां होनी चाहिय, अब वे खंड (2) में वर्णित शीर्षों में और वृद्धि नहीं करेंगे। संक्षेप में, यही भाव आप थापर के निर्णय में पायेंगे जो माननीय न्यायमूर्ति पातंजली शास्त्री द्वारा दिया गया था। उन्होंने कहा है कि वे इसका विस्तृत रूप से वर्णन नहीं करेंगे और चूंकि संविधान स्वयं सार्वजनिक व्यवस्था के प्रयोजनार्थ कानून बनाने का अधिकार संसद को नहीं देगा, उनके अनुसार संसद के पास ऐसा करने की सामर्थ्य ही नहीं है और इसीलिये वे संसद को ऐसा कोई प्राधिकार नहीं देंगे। प्रेस आपात्कालीन कानूनों संबंधी मामले में भी उन्होंने वही बात दोहराई है कि खंड (2) में ऐसा कोई शीर्ष नहीं है जो ससंद को यह इजाजत दे कि वह किसी अपराध के