33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 311

296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लिए उकसाने को रोकने के लिए कोई पाबन्दी निर्धारित करे। चूंकि प्रेस (आपात्कालीन शक्तियां) अधिनियम में किसी अपराध को करने के लिए उकसाने के लिए दंड की व्यवस्था है, संसद को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। संविधान की व्याख्या करने हेतु उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने आमतौर पर यही तर्क दिया है।

अन्तर्निहित शक्तियों के सिद्धान्त के बारे में भी उन्होंने आम तौर पर यही मत अपनाया है। व्यक्तिगत रूप से, मेरे अपने विचार में अन्तर्निहित शक्तियों के सिद्धान्त को मान्यता देने के लिए काफी गुंजाइश है और हमारे निदेशक सिद्धांतों में ऐसे उपबंध दिए गए हैं, जिनमें अन्तर्निहित शक्तियों का सिद्धान्त निहित है। मेरा निष्कर्ष है कि न्यायाधीशों ने तथा उनके समक्ष हाजिर होने वाले वकीलों ने भी इन निदेशक सिद्धान्तों का मजाक उड़ाया है। निदेशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 37 को उपहास का लक्ष्य बनाया गया है। अनुच्छेद 37 में कहा गया है कि ये निदेशक सिद्धांत वादयोग्य नहीं हैं और इन्हें लागू कराने के लिए कोई भी व्यक्ति सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर नहीं कर सकता। मैं मानता हूँ कि ऐसा ही है। किन्तु मेरा निवेदन है कि निदेशक सिद्धान्तों से निपटने का यह कोई तरीका नहीं है। निदेशक सिद्धांत क्या हैं? निदेशक सिद्धान्त वे दायित्व हैं, जो संविधान ने देश की विभिन्न सरकारों को सौंपे हैं वे कतिपय कार्य करेंगी, यद्यपि इसमें यह भी कहा गया है कि यदि उन सरकारों ने इन दायित्वों को पूरा नहीं किया, तो किसी को भी उन सरकारों के खिलाफ मुकदमा दायर करने का हक नहीं होगा। परन्तु इस तथ्य के बारे में किसी को आपत्ति नहीं है कि वे सरकार के दायित्व हैं। मेरा निवेदन यह है कि यदि वे सरकार की बाध्यताएँ हैं, तो सरकार उन्हें क्रियान्वित करने के लिए विधान बनाये बिना उनका निर्वाह कैसे करेगी? यदि दायित्वों के कथन के अनुसार विधि बनाना और उसे लागू करना आवश्यक है तो स्पष्ट है कि इन सभी निदेशक सिद्धांतों में राज्य का यह अधिकार भी निहित है कि वह उन सिद्धान्तों में वर्णित मामलों के सम्बन्ध में कानून बनाए। अतः मेरा कहना यह है कि जहां तक निहित शक्तियों के सिद्धांत का संबंध हैं, संविधान ने ही संसद को इस संबंध में कानून बनाने का अधिकार दे रखा है यद्यपि यह मूल अधिकारों के भाग में वर्णित उपबंधों के अन्तर्गत विनिर्दिष्ट तौर पर नहीं आता।

डॉ. एस.पी. मुखर्जी (पश्चिम बंगाल)ः भले ही वे संविधान के उपबंधों के अनुरूप न हों?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः वह अलग मुद्दा है।

श्री कॉमथः वह महत्वपूर्ण बात है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं यह कह रहा हूँ कि विभिन्न मौलिक अनुच्छेदों से जुड़े विभिन्न उपबंधों की व्याख्या ऐसे नहीं की जानी चाहिए मानों वे किसी कठोर बंधन में बंधे हों और उनके अलावा कुछ भी अनुज्ञेय न हो।