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श्री कॉमथः यह आपने स्वयं ही बनाया है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः जो बात सदन को बताने की कोशिश कर रहा हूँ वह यह है कि उच्चतम न्यायालय की इस घोषणा के कारण ही कतिपय शीर्षों में इस संसद को कानून बनाने का अधिकार नहीं है। सदन के समक्ष जो प्रश्न है वह यह हैः क्या हम स्थिति को ऐसे ही रहने दें, जैसी कि न्यायालयों के निर्णयों ने पैदा की है या हम संसद को कानून बनाने का अधिकार दे दें?
इस समय मैं एक अन्तर करना चाहता हूँ और मैं इस विशेष कारण से कर रहा हूँ क्योंकि डॉ. मुखर्जी आये और उन्होंने कहा कि हम वह स्वतंत्रता छीन रहे हैं जो लोगों को प्राप्त थी। मेरे विचार में कानून बनाने की सामर्थ्य और कोई विशेष कानून बनाने के बीच अन्तर करना आवश्यक है। कोई कानून विशेष, लोगों की स्वतंत्रता का अतिक्रमण करता है अथवा नहीं, आदि मामलों पर कानून बनाते समय चर्चा की जा सकती है। आज हम किसी कानून पर विचार नहीं कर रहे हैं, हम कानून बनाने के संबंध में संसद की सामर्थ्य पर विचार कर रहे हैं।
(श्रीमती दुर्गाबाई पीठासीन हुईं)
डॉ. एस.पी. मुखर्जीः इस मुद्दे के बारे में कि आप संसद में केवल यह कह रहे हैं कि वह आपको कानून बनाने का अधिकार दे, मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। क्या प्रस्तावित परिवर्तनों के अनुसार, वे सभी कानून जो अमान्य हो गये थे, भूतलक्ष प्रभाव से मान्य हो जाएंगे?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकः मैं जानता हूँ कि मेरे मित्र पं. भार्गव ने इस बात पर बहुत जोर दिया है और उसके संबंध में स्पष्टीकरण न देना मेरे लिए बहुत गलत बात होगी।
डॉ. एस.पी. मुखर्जीः और अति घृणित आपात् विधियाँ अच्छे सुविधि बन जाएँगे।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः ऐसी बात बिल्कुल नहीं है।
श्री कॉमथः लगभग।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अभी तक मैंने दो शीर्षों अर्थात् सावर्जनिक व्यवस्था और अपराध करने के लिए उकसाने को लिया है। तीसरा शीर्ष है मैत्रीपूर्ण संबंध। विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के बारे में 1932 में एक कानून बनाया गया था। यह सच है कि यह कानून उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के समक्ष निर्णय के लिए कभी भी नहीं लाया गया और अभी तक इसे अधिकारातीत घोषित नहीं किया