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माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मुझे उत्तर देने में कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते मैं समझ लूं कि वे क्या पूछ रहे हैं।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैंने एक अलग ही प्रश्न पूछा था। मेरा प्रश्न यह था कि क्या मानहानि संबंधी हमारा कानून विदेशी राज्यों का भी बचाव नहीं करता।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं करता।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मेरे विचार में, करता है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, यह केवल उसी स्थिति में लागू होता है जब एक व्यक्ति की मानहानि करता है। उस कानून में दूसरा खंड फ्राजनयिक अथवा वाणिज्य दूतावास के अधिकारी को गलत ढंग से धारण करनेय् के बारे में है। वह भी विदेशी संबंध संबंधी कानून के अधीन दंडनीय है। एक और महत्वपूर्ण खंड फ्किसी विदेशी सरकार की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने के षडयंत्र के बारे में है। वहां भी दंड तीन वर्ष तक का कारावास या पांच हजार डालर जुर्माना या दोनों हैं। अतः हमारा कानून बहुत उदार है।
श्री कॉमथः यदि सभी असत्य कथनों की महाही कर दी जाए, तो सारी कूटनीति समाप्त हो योगी।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हम नागरिकों द्वारा किसी विदेशी राज्य की सरकार को हानि पहुंचाने की बात कर रहे हैं।
श्री कॉमथः एक सरकार द्वारा दूसरी सरकार को नहीं?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अभी तक मैंने जो स्पष्टीकरण दिया है उसे देखते हुए सदन के सदस्य मेरे विचार से सहमत होंगे कि अनुच्छेद 19 में उस ढंग से संशोधन करने की आवश्यकता है जैसी विधेयक के खंड 3 के उप-खंड (1) में इसके लिए व्यवस्था की गई है।
कुछ माननीय सदस्यः नहीं।
डॉ. एस.पी. मुखर्जीः यदि यह केवल मानहानि से बचाव के लिए ही है, तो आप उसकी व्यवस्था अलग से क्यों कर रहे हैं?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः कभी-कभी किसी विशेष श्रेणी को अलग करना ही बेहतर होता है।
श्री कॉमथः स्वार्थपरता।