33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 319

304 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय सदस्य जानते हैं, अनुच्छेद 13 में यह घोषणा की गई है यदि कोई विधि मूल अधिकारों से असंगत है, तो वह शून्य एवं अप्रवर्तशील घोषित की जायेगी। जैसा कि मैंने अपनी टिप्पणियों में दर्शाया है, कुछ विधियों के उपबंधों को, जैसे भारतीय दंड संहिता की धाराएं 153क और 124क, प्रेस (आपात् शक्तियाँ) अधिनियम और सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियमों के कतिपय उपबंधों को उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा शून्य घोषित कर दिया गया है। इसको ध्यान में रखते हुए हमें क्या करना है? मेरे विचार में हमारे सामने तीन विकल्प हैं। एक तो यह कि हम संविधान में संशोधन न करें और शून्य उपबंध को ऐसे ही रहने दें। मेरे विचार में, इस सदन का कोई भी सदस्य इस विकल्प को पसंद नहीं करेगा। (एक माननीय सदस्यः यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा)। दूसरा विकल्प यह है कि हम संविधान में संशोधन करें और इसके तहत हमारे पास दो रास्ते हैं। एक तो यह कि हम संशोधित अनुच्छेद के अनुरूप इस विधि को पुनः अधिनियमित करें। यह एक तरीका है। संसद और विभिन्न राज्य विधानमंडल अपने-अपने सत्र बुलाएँ और इन विधियों पर पुनर्विचार करें। दूसरा तरीका यह है कि इन विधियों को पुनरुज्जीवित करें और यह कहें कि इन विधियों का पुनरुज्जीवन संशोधित संविधान में उल्लिखित उपबंधों के अधीन होगा। इसके अलावा और क्या किया जा सकता है? इस विधेयक में यही दूसरा तरीका अपनाया गया है।

विधेयक में कहा गया हैः जिन विधियों को उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों द्वारा शून्य और अकृत घोषित किया गया है, उन्हें प्रभावी माना जाये किंतु एक परन्तुक के अधीन रहते हुए, पर वे अपने मूल रूप में प्रभावी नहीं होंगे, बल्कि इस तरीके से और उस सीमा तक प्रभावी होंगे जो संशोधित अनुच्छेद 19 से संगत हो। यही स्थिति है। अब मैं सदन से यह जानना चाहता हूँ कि क्या वे इस संभावना पर गम्भीरतापूर्वक विचार करेंगे कि या तो यह संसद या प्रान्तों की विभिन्न विधानसभाएं पुनः अपने-अपने सत्र बुलायें और इन विधियों को पुनः अधिनियमिति करें।

डॉ. एस.पी. मुखर्जीः क्यों नहीं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः क्या इसके लिए समय है?

डॉ. एस.पी. मुखर्जीः यह क्या हो रहा है?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं नहीं जानता कि इसमें कितना समय लगेगा। परन्तु मुझे विश्वास है कि यदि मेरे मित्र डॉ. मुखर्जी बंगाल विधानसभा के सदस्य हों, तो वह इस कानून को वहां सें कम से कम छः महीने तक पास नहीं होने देंगे। उनके तर्क, उनके प्रभावशाली और जोरदार भाषण इन विधियों के पुनः अधिनियमन के मार्ग में चीन की दीवार बनकर आड़े आयेंगे। इसलिये इस संसद की अथवा स्थानीय विधानसभाओं की स्थिति को देखते हुए वर्तमान परिस्थितियों में आप यही नहीं मान सकते कि उनके