33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 321

306 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चाहता हूँ। उदाहरणार्थ, धारा 144 गैर-कानूनी प्रयोजनों के लिए किसी सभा का आयोजन करने पर रोक लगाती है। कोई जिला मजिस्ट्रेट एक उसी आशय का आदेश जारी करता है। कोई समाचार-पत्र कल लोगों को सलाह दे कि यह आदेश एकदम बेहूदा है और इसका पालन न किया जाए। क्या यह अपराध होगा अथवा नहीं, हालांकि यह न तो हिंसा के लिए और न ही हत्या के लिए उकसाने की बात है?

श्री राजागोपालाचारीः मेरा निवेदन है कि इतनी विस्तृत चर्चा प्रवर समिति के लिए छोड़ दी जाए। सिद्धांतों को स्पष्ट कर दिया गया है। अन्यथा हमारे पास बिल्कुल समय नहीं बचेगा।

श्री देशबन्धु गुप्ताः यदि माननीय मंत्री यह आश्वासन दे दें कि इसमें संशोधन कर दिया जायेगा, तो पर्याप्त होगा।

माननीय अध्यक्षः जो भी हो, जो सदस्य बार-बार बीच-बीच में बोल रहे हैं, अपनी बात कह चुके हैं उनके विचारों को नोट कर लिया गया है। अब माननीय विधि मंत्री को, जो बोल रहे हैं, अपनी बात कहने दीजिए।

श्री कॉमथः इसका मतलब यह हुआ कि जिन्होंने अपनी बात नहीं कही है, वे बीच-बीच में टोका-टाकी कर सकते हैं?

माननीय अध्यक्षः नहीं। इसका मतलत यह नहीं है। सदस्यगण इसका ध्यान रखें।

श्री शिवचरण लालः केवल एक प्रश्न। क्या भूतलक्षी प्रभावी से इसे लागू करना कानूनी होगा?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हाँ, निस्संदेह।

पं. ठाकुर दास भार्गवः क्या मैं एक सीधा सा प्रश्न पूछ सकता हूँ? क्या माननीय कानून मंत्री अनुच्छेद 19(2) के शब्दों से, जिसमें वह संशोधन करना चाहते हैं, संतुष्ट हैं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैंने सिद्धान्त स्पष्ट कर दिया है। जैसा मैंने कहा, यदि सिद्धांत को लागू करने के लिए भाषा बदलने की आवश्यकता होगी, तो उसमें भी कोई आपत्ति नहीं होगी। किन्तु सिद्धांत यह है कि उन विधियों को पुनर्जीवित किया जाएगा।

श्री देशबन्धु गुप्ताः माननीय मंत्री ने ‘उचित’ शब्द को हटाने पर कोई प्रकाश नहीं डाला है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह हटाया नहीं गया है। यह था ही नहीं।