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पं. ठाकुर दास भार्गवः किन्तु अन्य बातें तो थीं। आपने वे सभी रक्षात्मक उपाय वापस ले लिए हैं।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः वह अलग बात है। उस पर प्रवर समिति विचार करेगी।
अब मैं विधेयक के खंड 4 पर आता हूँ। यह खंड एक नये अनुच्छेद 31क को समविष्ट करता है। पहले हम यह समझ लें कि यह अनुच्छेद क्या करता है। यह अनुच्छेद राज्य को सम्पदा अर्जित करने की अनुमति देता है। दूसरे, इसमें कहा गया है कि जब कभी भी सम्पदा अर्जित करने के लिए कोई विधान बनाया जाता है, तो उस पर मूल अधिकारों की किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। मेरे विचार में इस अनुच्छेद के गुणावगुणों के बारे में निर्णय एक प्रश्न को ध्यान में रखकर लेना होगा और वह यह है कि क्या इस अनुच्छेद में कोई क्रान्तिकारी बात है?
श्री फ्रैंक एन्थनीः यह प्रतिक्रियावादी है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः क्या इस अनुच्छेद में कोई ऐसी बात है, तो अनुच्छेद 31 में नहीं है।
मैं सदन से चाहता हूँ कि वह इस दृष्टि से इस प्रश्न पर विचार करे। सदन को स्मरण होगा कि अनुच्छेद 31 के बाद के खंडों में यह उपबंध था कि यदि राष्ट्रपति एक प्रमाण-पत्र जारी कर दें, तो कतिपय विधियों पर, जो विचाराधीन है और पारित नहीं हुई हैं, मुआवजे के आधार पर आपत्ति नहीं की जायेगी। यह अनुच्छेद 31 के उस खंड का सार है। अनुच्छेद 31 का नया संशोधन न केवल मुआवजे संबंधी उपबंध के प्रवर्तन को, बल्कि भेदभाव संबंधी अनुच्छेद के प्रवर्तन को भी हटाता है। इस संशोधन में मैं ‘सम्पदा’ शब्द पर बल दे रहा हूँ। नया अनुच्छेद बहुत सीमित है। यह भूमि के अर्जन पर लागू नहीं होता। यह भूमि पर सम्पदा के अर्जन पर लागू होता है, जो कि एक बहुत भिन्न बात है। सम्पदा की इस विशेष अनुच्छेद में परिभाषा की गई है, अर्थात्, स्वामी, उपस्वामी, बटाईदार या अन्य बिचौलियों का अधिकार। यह शब्दावली अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग है। यह भूमि के अर्जन के संबंध में नहीं है। इस बात को ध्यान में रखना होगा। इसलिए अनुच्छेद 31क जो कहता है वह यह है कि जब सम्पत्ति के अर्जन के संबंध में कोई कानून बनाया जाता है, तो दो प्रश्न उठते हैं। एक तो मुआवजे की राशि का और दूसरा मुआवजे की राशि से संबंधित विभिन्न स्वामियों के बीच अन्तर का। ये ही दो प्रश्न उठ सकते हैं और इन्हीं के कारण मुकदमेबाजी होती है। जहां तक मुआवजे का संबंध है, हमने मूल अनुच्छेद 31 द्वारा स्वामित्व और जमींदारी के हितों के अर्जन के प्रश्न को पहले ही शामिल नहीं किया है। इस अनुच्छेद द्वारा हम विभेदमूलक उपबंध के प्रवर्तन को भी शामिल नहीं कर रहे हैं। इस अनुच्छेद के माध्यम से हम यही कह रहे हैं।