33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 324

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मजूदर हैं और मेरे विचार में उनकी संख्या बढ़कर पांच करोड़ से भी अधिक हो जाएगी। परन्तु जब आप भूमि जोतने वाले को भूमि का मालिक बनाने का कानून बना देंगे, तो आप इन भूमिहीन मजदूरों के कल्याण की क्या व्यवस्था करेंगे? वे जमींदारी उन्मूलन के बावजूद भी वहीं रहेंगे जहां वे इस समय हैं। इसलिए जो हो रहा है, उससे मैं बहुत प्रसन्न नहीं हूँ। परन्तु यह तो एक अलग बात है। इस समय हम इस प्रश्न पर विचार कर रहे हैं कि बिचौलियों को रहने देना चाहिये। मेरे विचार में इस पर कोई विवाद नहीं है कि बिचौलियों को समाप्त करना चाहिए और इसमें मूल अधिकार भी आड़े नहीं आने चाहिएं कि पर्याप्त मुआवजा नहीं दिया गया है या भेदभाव बरता गया है। मेरे पास एक बड़ा रोचक दस्तावेज है जो मुझे पश्चिम बंगाल की सरकार से प्राप्त हुआ है। माननीय सदस्यों को याद होगा कि फलाइड आयोग के नाम से बंगाल में जमींदारी समाप्त करने के लिये एक आयोग बनाया गया था। आयोग के अपना प्रतिवेदन देने के बाद, बंगाल सरकार ने यह जानने के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त किया कि फलाइड आयोग की सिफारिशों को कैसे लागू किया जाए और उस अधिकारी ने एक बड़ी ही दिलचस्प रिपोर्ट दी। मेरे पास उस रिपोर्ट की प्रति है, परन्तु इसे पूरा पढ़ने के लिए मेरे पास समय नहीं है। उस अधिकारी ने स्वयं सिफारिश की कि बराबर मुआवजा देना गलत होगा। यह न्यायसंगत नहीं होगा, हालांकि प्रशासन के लिए बराबर मुआवजा देना आसान होगा। उस अधिकारी ने मुजावजे की एक योजना बनाई है, जो बड़ी रोचक है। उसने क्रमिक मुआवजे की योजना बनाई है। यदि लाभ 2000 रुपये तक है तो मुआवजा शुद्ध लाभ का पन्द्रह गुना होना चाहिये। 2000 रुपये से 5000 हजार रुपये तक का मुआवजा बारह गुना होना चाहिए परन्तु 2000 रुपये तक लाभ पर मुआवजे की दी गई अधिकतम राशि से कम नहीं होना चाहिए। 5000 रुपये से 10,000 रुपये तक का मुआवजा दस गुना होना चाहिए परन्तु 2000 रुपये से 5000 रुपये तक के लाभ पर दिये गये अधिकतम मुआवजे से कम नहीं होना चाहिये और 10,000 रुपये से अधिक के लाभ के लिए यह आठ गुना होना चाहिए, परन्तु पिछली श्रेणी में बताई गई अधिकतम राशि से कम नहीं होना चाहिये। यह सब क्रमिक है। मुआवजे का यह प्रश्न बड़ा पेचीदा है। हमें इसमें खो नहीं जाना चाहिए। यदि आप कृषि की भलाई चाहते हैं, तो हमें इन बिचौलियों को हटाना होगा। पिछले अनुच्छेद में जमींदारी के अधिकारों के अर्जन के लिए मुआवजे को छोड़ दिया था। अब हम भेदभाव को छोड़ना चाहते हैं। मेरे विचार में अनुच्छेद 31 संचालन में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इन सम्पदाओं के अर्जन के लिए कानून है।

श्री शिवचरण लालः भेदभाव के बारे में अनुच्छेद 14 भी है। उसका क्या हुआ?

माननीय डॉ. बी.आर अम्बेडकरः इस समूचे अध्याय का चलन नहीं हो रहा है।

श्रीमती रेणुका रे (पश्चिमी बंगाल)ः जब माननीय मंत्री आगे बढ़ने के लिये तैयार हैं, तो वह पूरी तरह आगे क्यों नहीं बढ़ते?