312 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सम्मन किया जायेगा। संसद बेशक दो बार सम्मन की जाये, परन्तु राष्ट्रपति का अभिभाषण केवल एक बार ही होगा। जहां तब वाद-विवाद के पूर्वोदाहरण का संबंध है, उसे भी हटा दिया गया है। परन्तु ऐसी बात नहीं है कि कोई समय नहीं दिया जायेगा। यदि कोई अत्यावश्यक कार्य है जिसका पहले निपटारा करना जरूरी है, तो.........
श्री श्यामनन्दन सहायः मान लीजिए कि राष्ट्रपति सदन को सम्बोधित करना चाहते हैं, तो उन पर भी यह सीमा लागू होगी?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अब मैं अनुच्छेद 341 और 342 पर आता हूँ। जैसा कि सदन को विदित है, अभी भाग-क और भाग-ख राज्यों के संबंध में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों संबंधी आदेश जारी करने की शक्ति केवल राष्ट्रपति को दी हुई है, जबकि भाग-ग राज्यों के बारे में यह शक्ति संसद के पास है। इस स्थिति को अब बदला जा रहा है और भाग-ग राज्यों के संबंध में भी उक्त आदेश जारी करने की शक्ति प्रदान करता है, जो उन्हें संविधान के उपबंधों के अनुरूप बना सकें और यह शक्ति केवल दो वर्ष के लिए दी गई है। सदन को स्मरण होगा कि अन्य कार्यों के दबाव के कारण सरकार यह मानने के लिए कि वर्तमान विधियों में से कितनी विधियां संविधान क उपबंधों के अनुरूप नहीं हैं, सभी वर्तमान विधियों की जांच नहीं कर सकती। इसलिए यह महसूस किया गया कि वर्तमान विधियों में उक्त संशोधन करने की राष्ट्रपति की शक्ति एक वर्ष के लिए और बढ़ा दी जाए ताकि ऐसे तरीके निकाले जा सकें जिससे यह पता लगाया जा सके कि कौन सी विधियां असंगत हैं और उनके संबंध में एक समेकित आदेश जारी किया जा सके।
श्री कॉमथः इस अनुच्छेद में यह भी उपबंध है कि नये संविधान के अन्तर्गत एक बार संदन निर्वाचित हो जाने के बाद, राष्ट्रपति, इस शक्ति का प्रयोग नहीं करेगा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यदि यह अनुच्छेद ऐसी शक्ति देता है निःसंदेह तो उसका स्थान नई शक्ति ले लेगी।
श्री कॉमथः यह कैसे हो सकता है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः अब मैं अनुच्छेद 376 के खंड 13 पर आता हूँ। इस खंड के संबंध में काफी आपत्ति की गई है। यह उन व्यक्तियों की किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति और न्यायाधीश के पदों पर नियुक्ति के संबंध में है, जो भारत के नागरिक नहीं हैं। स्थिति इस प्रकार है। अनुच्छेद 217 के खंड 2 में कहा गया है कि उच्च न्यायालय का न्यायाधीश भारत का नागरिक होना चाहिए। अनुच्छेद 376 में यह व्यवस्था है कि वर्तमान न्यायाधीश, उन न्यायधीशों समेत जो संविधान लागू होने की तारीख को भारत के नागरिक नहीं थे, यदि वे चाहें तो न्यायाधीश बने रहेंगे। अब ऐसा है कि हमारे देश में उच्च न्यायालय के कोई चार न्यायाधीश ऐसे हैं, जो संविधान