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लागू होने की तारीख को किन्हीं उच्च न्यायालो के न्यायाधीश तो थे परन्तु वे भारत के नागरिक नहीं थे। उन्होंने अपने पदों पर बने रहना ठीक समझा और वे सेवानिवृत्त नहीं हुए। इसलिए हम अनुच्छेद 376 के उपबंधों के अन्तर्गत उन्हें उनके पदों पर कायम रखने के लिए मजबूर थे। अब एक प्रश्न उठा है और वह यह है। क्या ऐसा व्यक्ति उस न्यायालय में जहां वह सेवारत है या किसी अन्य न्यायालय में मुख्य न्यायाधिपति नियुक्त हो सकता है? एक और प्रश्न उत्पन्न हो गया है और वह यह है कि क्या ऐसा न्यायाधीश दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानान्तरित हो सकता है? इसमें मुद्दा यह है कि मुख्य न्यायाधिपति के रूप में नियुक्ति या न्यायाधीश की एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानान्तरण एक नई नियुक्ति है? यदि यह नई नियुक्ति है तो स्पष्टतः अनुच्छेद 217(2) के उपबंध लागू होंगे। इसे एक बड़ी कठिनाई समझा गया क्योंकि यह कल्पना नहीं की जा सकती कि संसद का आशय उन्हें केवल उनके पदों पर बनाये रखना था और उनके भविष्य का ध्यान नहीं रखना था। ऐसा आशय बिल्कुल नहीं था। अतः राष्ट्रपति ने, अनुच्छेद 392, खंड (2) के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, इस स्थिति को एक आदेश जारी करके विनियमित कर दिया। इस आदेश पर कई लोगों ने आपत्ति की और इसे राष्ट्रपति की शक्ति से बाहर बताया। इन संदेहों को दूर करने के लिए यह बेहतर समझा गया कि संविधान में ही इसकी व्यवस्था कर दी जाये, और इसीलिए खंड 13 को इस विधेयक में शामिल किया गया है।
माननीय अध्यक्षः क्या माननीय मंत्री बताएँगे कि स्थानान्तरण के बारे में शुरू में ही क्यों नहीं सोचा गया? क्या यह इस खंड द्वारा उत्पन्न की गई एक नई स्थिति नहीं है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरे विचार में, अनुच्छेद 376 का आशय है, अर्थात् जब उन्हें एक बार पद पर बने रहने दिया गया है, तो यह सभी प्रयोजनों के लिये है चाहे वह स्थानान्तरण हो अथवा पदोन्नति।
परन्तु कुछ लोगों ने यह कठिनाई महसूस की है कि.......
पं. ठाकुर दास भार्गवः विचार यह था कि मुख्य न्यायधिपति देश का नागरिक अवश्य होना चाहिए। अब क्या हो गया?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः कारण स्पष्ट है। जब आप किसी व्यक्ति को न्यायाधीश के रूप में स्वीकार करते हैं, तो यह आप अपनी सुविधा के लिए करते हैं और आप उसे किसी अन्य न्यायालय में भी स्थानान्तरित करने की स्थिति में होने चाहिएं। न्याय का तकाज़ा है कि उसकी पदोन्नति भी नहीं रोकी जानी चाहिए।
पं. ठाकुर दास भार्गवः क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जो भारत का नागरिक नहीं है, भारत के प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लेंगे?