314 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हम इन चार विशेष मामलों पर विचार कर रहे हैं। (व्यवधान) उपबंध एकदम स्पष्ट है और मेरे विचार में इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता।
मेरे विचार में मैंने चर्चा के दौरान उठाये गये सभी प्रश्नों का उत्तर दे दिया है। यदि कुछ रह गया है, तो उस पर विधेयक पर खण्डवार विचार करते समय चर्चा कर लेंगे।
संविधान (पहला संशोधन) विधेयक, 1951
ऽश्री जवाहरलाल नेहरूः अब तो यह एक परम्परा बन गई हैµमैं नहीं कह सकता कि यह इससे भी अधिक है और क्या यह संविधान में ही हैµकि जो कुछ भी संविधान की समवर्ती सूची में है, जो भी कानून किसी राज्य के विधानसभा द्वारा पास किया जाता है। वह यहां भी विचार और राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए आता है। क्या स्थिति यही है?
एक माननीय सदस्यः नहीं, जब तक यह सदन ऐसा कोई कानूनन बना दे, तब तक यह स्थिति नहीं है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यदि वह असंगत है।
एक माननीय सदस्यः नहीं, जब तक यह सदन ऐसा कोई कानून पास न कर दे।
श्री जवाहरलाल नेहरूः मेरा मतलब यह था कि यदि स्पष्ट असंगति है, तब तो वह प्रवृत्त नहीं होती। यह तो स्पष्ट है। परन्तु इस बात की जांच करने के लिए कि असंगत नहीं है और यह देखने के लिए कि यह जो विधायी सूचियों में वर्णित है उसके अनुरूप ही है और यह राष्ट्रपति की सहमति के लिए यहां आता है। इसलिए वास्तव में.........
श्री भारती (मद्रास)ः यह आवश्यक नहीं है।
श्री जवाहरलाल नेहरूः मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि यह आवश्यक है क्योंकि इस स्थिति में कानून प्रभावी नहीं होता। परन्तु मुझे बताया गया है कि यह वास्तव में अपने आप ही होता है। ऐसे सभी कानून यहां रोज आते हैं। पहले वे जांच के लिए गृह मंत्रालय और विधि मंत्रालय के पास आते हैं, फिर वे राष्ट्रपति के पास आते हैं ताकि पता चल सके कि वह उनका अनुमोदन करते हैं या नहीं। अतः वे यहां अवश्य आते हैं। मैं तो उससे भी आगे जाने के लिए तैयार हूँ, यदि सभी चाहें तो राष्ट्रपति की सहमति संबंधी खंड को अनुच्छेद 19 में जोड़ने के लिए तैयार हूँ। यह निर्णय करना सदन का काम है।
ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 31 मई, 1951, पृष्ठ 9610