33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 330

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ऽडॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जीः अपना स्थान ग्रहण करने से पूर्व मैं प्रधान मंत्री से एक बार फिर अनुरोध करूंगा कि ‘राज्य’ के स्थान पर ‘संसद’ शब्द प्रतिस्थापित करने के बारे में मेरे दो संशोधनों के मुख्य उद्देश्यों पर विचार करें अथवा यदि यह सम्भव नहीं है तो कम से कम यह व्यवस्था करें कि इस संबंध में राज्यों द्वारा पास किये गये कानून राष्ट्रपति की सहमति के अध्यधीन होंगे। यदि यह कर दिया गया तो इससे हमारे सामने आने वाली कठिनाइयां काफी हद तक दूर हो जाएँगी।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इस वाद-विवाद के बीच में बोलने का मेरा एक ही कारण है कि मैं उन सांविधानिक उपबंधों के बारे में कुछ बातों को स्पष्ट करना चाहता हूँ जो प्रस्तुत संशोधनों में अन्तर्विष्ट हैं। सबसे पहले मैं इन दोनों संशोधनों को एक साथ लेना चाहता हूँ। पहला संशोधन तो यह है कि संसद के पास उन उपबंधों के अधीन जो अनुच्छेद 19 के प्रस्तावित खंड (2) में पुनःस्थापित किये जा रहे हैं, विधि बनाने की अनन्य शक्ति होनी चाहिये और दूसरा यह कि यदि यह सम्भव नहीं है तो राष्ट्रपति को इन नये प्रस्तावित खंड के अन्तर्गत बनाई गई किसी विधि पर अपनी सहमति देने की शक्ति होनी चाहिये। और जब तक वह सहमति नहीं दी जाये तब तक वह विधि वैध नहीं मानी जानी चाहिए।

संसद के लाने के बारे में दो बातें हैं जिन पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाना चाहिए। एक तो यह कि क्या यह सम्भव है कि संसद को नये खंड (2) के अन्तर्गत आने वाले क्षेत्र में विधि बनाने की अनन्य शक्ति दी जानी चाहिए? इस मामले पर मैं सदन का ध्यान अनुच्छेद 368 की ओर दिलाना चाहता हूँ, जो संविधान में संशोधन करने के बारे में है। इस अनुच्छेद में संविधान के उन अनुच्छेदों का संशोधन करने का उल्लेख है जिनके लिए संशोधन को विधिवत पारित माने जाने से पूर्व राज्यों का अनुसमर्थन आवश्यक है। मैं अनुच्छेद 368 में वर्णित संशोधनों की सभी विभिन्न श्रेणियों का उल्लेख नहीं करूंगा। यहां मैं केवल एक श्रेणी का ही उल्लेख करूँगा और वह है भाग ग्यारह का अध्याय-एक। अनुच्छेद 368 में कहा गया है कि यदि किसी ऐसे अनुच्छेद का संशोधन किया जाता है, जो भाग-ग्यारह के अध्याय-एक का अंग है, तो ऐसे संशोधन के लिए राज्य का अनुसमर्थन आवश्यक है। अनुच्छेद 246 का खंड (3), भाग-ग्यारह के अध्याय-एक के अन्तर्गत आता है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि राज्यों को सूची-दो, की किसी प्रविष्टि के संबंध में विधि बनाने की अनन्य शक्ति प्राप्त होगी। इसका मतलब यह हुआ कि संसद को सूची-दो की किसी मद के संबंध में कानून बनाने का अधिकार नहीं है। यदि आप सूची-दो को देखें तो आप पायेंगे कि उस सूची की प्रविष्टि 1 सार्वजनिक व्यवस्था के बारे में हैं। इस संशोधन विधेयक द्वारा सार्वजनिक

ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 1 जून, 1951, पृष्ठ 9861-69