18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री नजीरुद्दीन अहमदः यह अब समाप्त हो गया है।
ऽप्रांतेतर अधिकारिता विधेयक...........जारी
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः यदि विधानमंडल के किसी सदस्य द्वारा, जो कि वकील नहीं है, इस खंड 6 को एक असामान्य बात के रूप में वर्णित किया गया होता तो मुझे किसी प्रकार की शिकायत नहीं होती। किंतु में समझता हूँ कि एक वकील द्वारा खड़े होकर यह कहने पर कि यह खंड न केवल असामान्य और विचित्र है बल्कि यह न्यायपालिका के आधार को ही ध्वस्त करता है, मैं आश्चर्य व्यक्त किए बिना नहीं रह सकता। श्रीमान् जी, जैसा कि हर वकील जानता है, विधि द्वारा दो वर्गों के अधिकारों में अंतर किया जाता हैµराजनीतिक अधिकार और न्याय्य अधिकार। न्याय्य अधिकार सदैव, न्यायालय के समक्ष पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पर आधारित किसी न्यायिक डिक्री द्वारा अवधारित किए जाने चाहिए। किंतु राजनीतिक अधिकार, और मैं अभी यह स्पष्ट करूंगा कि राजनीतिक अधिकार का क्या अर्थ है, सामान्य अर्थ में कभी भी न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किए जाते। अब दो राज्यों के मध्य अधिकार, चाहे वे संवदित्मक हों या अन्यथा न हों, कभी भी न्याय्य अधिकार नहीं समझे जाते। उन्हें सदैव राजनीतिक अधिकार समझा जाता हैः और यही एक कारण है कि इस खंड को इस विधेयक में क्यों शामिल किया गया है। राजक्षेत्रातीत अधिकारिता, जिसे देशी रियासतों द्वारा भारतीय डोमिनियन को प्रदत्त किया जरा रहा है, दो राज्यों के मध्य का विषय है, न कि दो व्यक्तियों के मध्य का, और दो राज्यों के मध्य का मामला होने के कारण अधिकारिता से सम्बद्ध सभी मामले निश्चित रूप से राजनीतिक अधिकार हैं ओर इसीलिए उन्हें न्यायपालिका द्वारा अवधारित किए जाने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। जैसा कि मैंने बताया, यह खंड किसी भी तरह से असामान्य नहीं हैं, क्योंकि यदि मेरे माननीय मित्र ब्रिटिश अधिनियम का, जिस पर यह आधारित है, निर्देश करते हैं और खंड-4 को देखें तो उन्हें यह पता चलेगा कि खंड-6 की भाषा बिल्कुल वैसी ही है जैसी कि खंड-4 की है। अब, मेरे माननीय मित्र ने यह भी कहा कि उन्हें साक्ष्य अधिनियम में उन कतिपय उपबंधों की जानकारी है, जहाँ भारत सरकार के किसी विभाग के सचिव द्वारा दिए गए प्रमाणपत्र को उसकी प्रामाणिकता का निश्चायक साक्ष्य कहा जाता है, किंतु उसे किसी विशिष्ट व्यक्ति की हैसियत तय करने के लिए कभी भी स्वीकार नहीं किया गया। मुझे विश्वास है कि वह सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 86 को भूल गए हैं। यदि वे सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा-86 को पढ़ेंगे तो उन्हें उसमें एक ऐसा उपबंध मिलेगा जो इस विधेयक के खंड-6 में अंतर्विष्ट उपबंधों से बहुत मिलता-जुलता है। सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा-86, किसी भारतीय राजा या विदेशी दूत या किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जिसे भारतेतर नागरिक की हैसियत या स्थिति प्राप्त हो, किसी वाद से संबंधित है। सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा-86
ऽसं. स. (वि.) वा., खंड II, 9 दिसम्बर, 1947, पृष्ठ 1580-82