4. प्रांतेतर अधिकारिता विधेयक - Page 34

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द्वारा यह उपबंध किया गया है कि किसी भारतीय राजा के विरुद्ध कोई वाद तब तक नहीं चलाया जा सकता जब तक कि भारतीय राजा के विरुद्ध वाद लाने वाला पक्षकार विदेशी मंत्री से इस आशय की सहमति न प्राप्त कर ले कि उस पर वाद चलाया जा सकता है। धारा-86 का मूल उद्देश्य यह है कि भारत सरकार को अपनी यह राय अभिव्यक्त करने का अवसर दिया जाए कि क्या वह उस विशिष्ट राजा को, जिसपर वाद चलाया गया है, प्रभुतासंपन्न राजा की स्थिति दिए जाने का हकदार मानती है। यदि उनके विचार में वह प्रभुतासंपन्न राजा की स्थिति दिये जाने का इकदार है तो हम एक प्रमाणपत्र जारी करती हैं कि वह प्रभुतासंपन्न राजा हैं और जैसे ही वह प्रमाणपत्र जारी हो जाता है यह मामला राजनीतिक मामला बन जाता है और सामान्य अर्थ में न्याय्य नहीं रह जाता और वाद असफल हो जाता है। इसमें कुछ भ असामान्य नहीं है।

मेरे माननीय मित्र चाहते हैं कि मैं इस कुछ विषय स्थिति का कारण बताऊं जिसे विधि न केवल इस देश में बल्कि प्रत्येक अन्य देश में भी मान्यता देती हों। उनकी जानकारी के लिए मैं यह कारण बता सकता हूँ कि यह अन्तर क्यों किया गया है। श्रीमान् जी, मान लीजिये, किसी देश का विभाग, यह मानते हुए कि कोई विशिष्ट राजा प्रभुतासंपन्न राजा है, उससे इस आधार पर व्यवहार करता है। तथा उसकी स्थिति के प्रश्न को यदि किसी सामान्य न्यायालय द्वारा विनिश्चित किए जाने के लिए छोड़ दिया जाता है, जिसमें साक्ष्य प्रस्तुत किया जाए और न्यायालय यह निष्कर्ष निकाले कि वह प्रभुतासंपन्न राजा के अर्थ में शासक राजा नहीं है तो फिर क्या होगा? इस तरह की स्थिति में हमारे पास दो परस्पर विरोधी निर्णय हैं´µएक निर्णय न्यायपालिका द्वारा किया गया है और दूसरा निर्णय राज्य द्वारा किया गया है एवं दोनों में कोई सामंजस्य नहीं है। ऐसी स्थिति में, डिक्री का निष्पादन पूर्णतया असंभव हो जाता है। इंग्लैण्ड में, जैसा कि मेरे माननीय मित्र जानते हैं, साक्ष्य अधिनियम जैसी कोई चीज नहीं हैं, किंतु वहाँ वह सुस्थापित नियम है, जिसे ब्रिटिश न्यायपालिका ने अपनाया हुआ है, कि इस प्रकार के मामलों में, जहां राज्य के राजनीतिक विभाग से विरोध की संभावना हो, वहाँ वे अभिवाक् पर विचार नहीं करेंगे और निर्णय दे देंगे, क्योंकि अंततः न्यायपालिका की किसी डिक्री पर निर्णय का निष्पादन राज्य के विभाग द्वारा ही किया जाना होता है ओर वे राज्य के विभाग के साथ उलझना नहीं चाहते। मेरे विचार में यह बहुत ही हितकर कारण है कि न्यायालय ऐसे मामले में, जिसके राजनीतिक हो जाने की संभावना है, कोई अधिकारिता प्रयोग करने से कतराते हैं।

अतः मेरा निवेदन है कि यह खंड 6 बहुत उपयुक्त और समुचित खंड है और विधेयक में यथावत् रहना चाहिए।

माननीय अध्यक्षः प्रश्न यह हैः

फ्कि खंड 6 विधेयक का भाग बन गया है।य्

प्रस्ताव स्वीकार किया गया। (खंड 6 विधेयक में जोड़ा गया)