316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
व्यवस्था संबंधी विधान को हम पहली बार अनुच्छेद 19 के खंड (2) में शामिल कर रहे हैं। इसलिए यह स्पष्ट है कि यदि आप संसद को सार्वजनिक व्यवस्था के संबंध में कानून बनाने का अधिकार देना चाहते हैं, जो सूची-दो में शामिल है, और जो अनुच्छेद 246(3) के अनुसार राज्यों के विधायी क्षेत्राधिकार में आता है, तो यह स्पष्ट है कि ऐसे संशोधन के लिए राज्यों के अनुसमर्थन की आवश्यकता होगी। अतः इस संबंध में सरकार का और इस सदन का आशय एकदम स्पष्ट है कि हम किसी ऐसे खंड में कोई संशोधन नहीं करना चाहते, जिसके लिए राज्यों की सहमति या अनुसमर्थन प्राप्त करने की आवश्यकता पड़े। उस दृष्टि से जिन सदस्यों ने यह संशोधन पेश किया है कि वे इस बात से सहमत होंगे कि इस संशोधन को एक ऐसी कठिनाई में डाले बिना स्वीकार करना सम्भव नहीं है जिसे यह सदन उस समय-सीमा के अन्दर पार नहीं कर सकेगी, जो हमने इस विधेयक को पास करने के लिए तय की है।
जैसा कि प्रधानमंत्री ने कल कहा था, हम सभी को इस प्रस्ताव के साथ सहानुभूति है कि यदि यह सम्भव हो तो संसद को विधान बनाने की शक्ति दी जानी चाहिए। हम इस सुझाव के पक्ष में भी हैं कि राष्ट्रपति को विधेयक के कानून बनने से पहले उस पर अपनी सहमति देने का अधिकार होना चाहिए। परन्तु हमें इस प्रश्न पर विचार करना है कि क्या यह आवश्यक है? क्या यह संविधान के उपबंधों में नहीं दिया हुआ है? अब मैं विधान के उन शीर्षों का जो इस खंड में शामिल किए गए हैं, और सातवीं अनुसूची की विभिन्न प्रविष्टियों में उन्हें जो स्थान मिला है, उसका उल्लेख करना चाहूँगा।
राज्य की सुरक्षा को ही लीजिए। राज्य की सुरक्षा जैसी कोई विशेष प्रविष्टि नहीं है। इसका कारण यह है कि राज्य की सुरक्षा विभिन्न प्रविष्टियों द्वारा की जा सकती है और यह शक्ति विभिन्न शीर्षों के अन्तर्गत बांटी गई है। माननीय सदस्य देखेंगे कि सूची-1 की प्रविष्टि-1, जहां तक राज्य की सुरक्षा का सम्बन्ध है बहुत संगत प्रविष्टि है। दूसरे शीर्ष को लीजिए। वह विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बंधों के बारे में है। यह सूची-1 की प्रविष्ट-9, 10 और 14 के अन्तर्गत आता है। तीसरे शीर्ष सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार और नैतिकता को लीजिए। वह सूची-2 की प्रविष्टि 1 में है।
डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जीः कौन-सी प्रविष्टि?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह कुछ हद तक सूची 2 की प्रविष्टि 1 है। जहां तक समाचार-पत्रों, पुस्तकों आदि का संबंध है, यह सूची 3 की प्रविष्टि 39 से सम्बन्धित है। न्यायालय का अवमान सूची-1 की प्रविष्टि 95 और सूची 3 की प्रविष्टि 14 में आता है। मान हानि सूची 3 की प्रविष्टि-1 में है। किसी अपराध के लिए उकसाना सूची 3 की प्रविष्टि 1 में है।
इस जानकारी के आधार पर मेरे विचार में सदन को यह बात समझ आ जाएगी कि