33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 334

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डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जीः इसका मतलब यह हुआ कि किसी अपराध को उकसाना सूची 2 में सार्वजनिक व्यवस्था के अन्तर्गत नहीं आता.....

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं उस बात से भाग नहीं रहा हूं। मैं इसमें पूरी रुचि रखता हूँ।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जीः मैं जानता हूँ, आप रखते हैं।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः हाँ, मैं रखता हूँ।

अब मैं राष्ट्रपति की अनुमति पर आता हूँ। संविधान के अनुच्छेद 200 के अंतर्गत विभिन्न राज्यों के राज्यपालों अथवा राजप्रमुखों को यह अधिकार प्राप्त है कि वे किसी विशेष विधेयक पर अपनी अनुमति न दें और उसे राष्ट्रपति के पास भेज दें। राज्यपाल को अपनी मंत्री की सलाह पर कार्य करना होता है और यदि वह यह महसूस करता है कि किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास उसके विचार के लिए भेजा जाना चाहिए, तो यह अधिकार उसे है। इसके लिए कोई नया अधिकार देने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि यह अधिकार एक तरह से निरर्थक है, क्योंकि यह सरकार द्वारा उसे दी गई सलाह पर निर्भर है और जो सरकार उस विधेयक के पास करने में शामिल है। वह राज्यपाल के विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजने की सलाह कैसे दे सकती है?

अनुच्छेद 254 समवर्ती क्षेत्र के कानूनों से संबंधित है और यह अनुच्छेद कहता है कि यदि संसद द्वारा बनाये गये कानून और राज्य विधानमंडल द्वारा उसी विषय पर बनाये गये वैसे ही कानून के बीच कोई परस्पर विरोध है, तो राज्य का कानून, परस्पर विरोध और असंगतता की सीमा तक, अवैध होगा। इसके अतिरिक्त, उसी अनुच्छेद के

खंड (2) में एक और उपबंध है कि यदि ऐसा कानून जो उसी विषय पर संसद द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार असंगत है, राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित कर दिया जाता है और राष्ट्रपति उसकी असंगतता के बावजूद अपनी अनुमति दे देता है, तो वह कानून जहां तक उस राज्य का संबंध है, अवैध रहेगा। जहां तक विधि मंत्रालय में हमारा अनुभव है, लगभग प्रत्येक राज्य को यह भय है कि हो सकता है उसका कानून असंगत पाया जाए और इसलिए उसे अवैध घोषित कर दिया जाए। इससे बचने के लिए राज्यों ने सबसे अधिक सुरक्षित रास्ता अपनाया है कि सभी विधेयकों को राष्ट्रपति के पास उसके विचार और अनुमति के लिए भेज दिया जाये और राष्ट्रपति ने या तो उसी रूप में जिस रूप में विधेयक है या कुछ उपान्तरों के साथ उस पर अपनी सहमति दे ही दी है। अतः मेरा निवेदन यह है कि जहां तक संविधान का संबंध है, अनुच्छेद 200 और 254 (2) में यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त रक्षोपाय हैं कि ऐसे विधेयक राष्ट्रपति तक अवश्य पहुंचें और वह उन पर विचार करें और अनुमति दें।