33. संविधान (प्रथम संशोधन) विधेयक - Page 336

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पड़ सकता है, जो दमन और डरा-धमकाकर धन ऐंठने की कोई योजना या कार्यक्रम बनाने और उसे क्रियान्वित करने का उद्देश्य तथा पर्याप्त सामर्थ्य रखता हो।य्

यह भी एक ऐसी मांग है जिस पर प्रेस की स्वतंत्रता से निपटने की दृष्टि से विचार किया जाना चाहिए। दूसरी बात जो मेरे मित्र बार-बार दोहरा रहे हैं वह वाक्-स्वातंत्र्य से संबंधित मामलों पर विचार करते समय जस्टिस होम्स द्वारा प्रयोग किया गया पद है अर्थात् फ्स्पष्ट और वर्तमान खतराय्। मैं यह जानने की कोशिश कर रहा हूँ कि क्या जहां तक हमारा संबंध है, यही बहुत ही नया मत है। मैं चाहता हूँ कि हमारे न्यायधीशों को भी यही मत अपनाना चाहिये। उदाहरण के लिए, मान लीजिये, किसी प्रोफेसर ने दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों के समक्ष साम्यवाद पर भाषण दिया। वह छात्रों के सामने उन हिंसक तरीकों का जिक्र करे जिन्हें साम्यवादी अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए अपनाते हैं। तो मैं नहीं समझता कि कोई यह कहेगा, क्योंकि उन्होंने छात्रों के समक्ष भाषण दिया, इसलिए वह किसी अपराध के दोषी हैं। कोई ‘स्पष्ट और वर्तमान खतरा’ नहीं था और मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे न्यायाधीश भी वही तर्क अपनायेंगे। इसलिए, जैसा मैंने कहा, मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि हमारे मित्र किन्हीं नारों और अमेरिका में न्यायालयों के कतिपय निर्णयों में अपनी इतनी निष्ठा क्यों बनाए हुए हैं।

अब मैं हिंसा में ‘उत्तेजना’ को सीमित करने के प्रश्न को लेता हूँ और मैं अपने मित्र डॉ. श्यामाप्रसाद मुखकर्जी और पं. कुंजरु से चाहूंगा कि वे जो मैं कह रहा हूँ उस ओर ध्यान दें और मैं कुछ विशेष मामले ही लूंगा। सर्वप्रथम मैं यह जानना चाहूंगा कि क्या वे ‘हिंसा’ शब्द के अर्थ की कोई सूक्ष्म परिभाषा दे सकते है। फ्हिंसा क्या है?य् क्या यह शारीरिक हिंसा तक ही सीमिति है?

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जीः हिंसक शब्दों को ही छोड़ दिया जाये।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं हिंसक शब्दों की बात नहीं कर रहा हूँ। क्या वह हमें कोई सूक्ष्म परिभाषा बता सकते हैं जिससे विधानमंडल और न्यायालय मान सकें कि यह हिंसा है और यह हिंसा नहीं है। मुझे तो ऐसी परिभाषा कहीं नहीं मिली।

श्री कॉमथः आप कह सकते हैं कि फ्विधि द्वारा यथापरिभाषित।य्

माननीय डॉ. बी.आर अम्बेडकरः यह तो कठिनाई को टालना हुआ। जब कभी भी हम कानून बनायेंगे तो हमें फ्हिंसाय् की परिभाषा देनी होगी।

अब मैं विशिष्ट उदाहरणों पर आता हूँ। मान लीजिए किसी गांव में अनुसूचित जातियों और सवर्ण हिन्दुओं के बीच झगड़ा होता है और सवर्ण हिन्दू अनुसूचित जातियों का सामाजिक बहिष्कार करने का षडयंत्र रचते हैं। उन्हें कोई सामान लेने से, खेतों में जाने से, लकड़ी लाने के लिए जंगल जाने से रोकते हैं, तो मैं डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी और