324 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कथन है कि हमें न्यायोचित और पर्याप्त प्रतिकर देना चाहिए, पर बहुत ज्यादा नहीं। और मैं इस कथन से सहमत हूँ। परन्तु हमें यथार्थ को भी देखना चाहिए। मैं जमींदारी समाप्त करने में सरकार के साथ हूँ परन्तु यह न्यायोचित ढंग से की जानी चाहिए।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः उचित प्रतिकर शब्द अनुच्छेद 31 में नहीं है।
श्री हुसेन इमामः ये माननीय प्रधान मंत्री के शब्द थे। जहां तक अनुच्छेद 31 का संबंध है, मेरा आरोप यह है कि सात अधिनियम जो आप हम पर थोप रहे हैं, अनुच्छेद 31 के मूल उपबंधों में नहीं थे।
माननीय डॉ. बी.आर अम्बेडकरः वे नये अनुच्छेद 31-क द्वारा विनियमित होते हैं।
श्री हुसेन इमामः मैं यह कह रहा था कि हमें सच्चाई का सामना करना चाहिए। समाजवादी पार्टी के लोग कहते हैं कि वे उन किश्तों को नहीं देंगे जो कांग्रेस सरकार द्वारा तय की गई हैं। साम्यवादियों ने भी यह घोषणा की है कि वे इसे नहीं मानेंगे। तो फिर आप इस भुलावे में क्यों रह रहे हैं कि यह 40 वर्षों में दे दिया जायेगा? आधी छोड़ सारी को धावे आधी रहे न सारी पावे। यदि देना चाहते हैं तो अभी दीजिए। आपको छोटे भूस्वामियों और जमींदारों की दशा को समझना चाहिए, जिनकी आमदनी 500 या 600 या 1000 रुपये है। वह कोई बड़ा पूंजीपति नहीं है। मेरा कहना यह है कि कम आय वाले लोगों को मुआवजा एकमुश्त दिया जाना चाहिए, ताकि वे कोई कारोबार शुरू कर सकें।
ऽमाननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः जहां तक मेरे अपने संशोधन का संबंध है, मैं नहीं समझता कि उसका समर्थन करने के लिए किसी तर्क की जरूरत है। मेरे संशोधन में फ्सम्पदाय् शब्द के अर्थ की केवल व्याख्या की गई है। कुछ लोगों का कहना है कि जब फ्सम्पदाय् शब्द की परिभाषा के संबंध में भाग-क राज्यों में विद्यमान विधियों को यान में रख लिया है, हमने भाग-ख राज्यों में प्रचलित फ्सम्पदाय् शब्द की परिभाषा का पूरा ध्यान नहीं रखा गया है। यही सन्देह दूर करने के लिए मैंने महसूस किया है इसका ध्यान रखना और फ्सम्पदाय् शब्द की परिभाषा को विस्तार देना जरूरी है। वही मैं अपने संशोधन द्वारा करना चाहता हूँ।
मेरे मित्र चौधरी रणबीर सिंह ने जो बात उठाई है मैं इसका उत्तर देने के लिए
खड़ा हुआ हूँ। उनका तर्क, यदि मैंने ठीक समझा तो यह था, कि भारत के कुछ राज्यों में फ्सम्पदाय् शब्द का हम बड़ा सीमित अर्थ लेते हैं। हम इसमें केवल बिचौलियों को
ऽसं. वा., खंड 12, भाग II, 1 जून, 1951, पृष्ठ 9912-15