5. फेडरल न्यायालय (अधिकारिता का विस्तार) विधेयक - Page 35

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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फेडरल न्यायालय (अधिकारिता का विस्तार) विधेयक

ऽमाननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः श्रीमन, मैं, सिविल मामलों में फ़ेडरल न्यायालय की अपीली अधिकारिता के विस्तार का उपबंध करने के लिए एक विधेयक प्रस्तुत करने की इजाजत चाहता हूँ।

माननीय अध्यक्षः प्रश्न यह हैः

फ्कि सिविल मामलों में फ़ेडरल न्यायालय की अपीली अधिकारिता के विस्तार का उपबंध करने के लिए एक विधेयक प्रस्तुत करने की इजाजत दी जाए।य्

प्रस्ताव अंगीकार किया गया।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः श्रीमान् जी, मैं विधेयक पुरःस्थापित करता हूँ।

ऽऽफ़ेडरल न्यायालय (अधिकारिता का विस्तार) विधेयक

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः श्रीमन, मैं प्रस्ताव पेश करता हूँः

फ्कि सिविल मामलों में प़ेQडरल न्यायायल की अपीली अधिकारिता के विस्तार का उपबंध करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्

यथा अनुकूलित भारत अधिनियम के अधीन गठित फ़ेडरल न्यायालय तीन प्रकार की अधिकारिताओं का प्रयोग करता हैः

(क) धारा 204 के अधीन आरंभिक अधिकारिता_

(ख) धारा 205 के अधीन उच्च न्यायालयों पर अपीली अधिकारिता_ और

(ग) धारा 213 के अधीन सलाहकारी अधिकारिता।

प्रस्तुत विधेयक का संबंध प़ेQडरल न्यायालय की केवल अपीली अधिकारिता से है। जैसाकि मैं कह चुका हूँ, धारा 205 के अधीन प़ेQडरल न्यायालय की अपीली अधिकारिता बहुत समिति अधिकारिता है। प्रथमतः यह केवल उन मामलों तक सीमित है जहाँ अंतर्ग्रस्त मुद्दा संविधान का निर्वचन, दूसरे शब्दों में, भारत शासन अधिनियम, 1935 का निर्वचन हो।

दूसरे, फ़ेडरल न्यायालय के लिए सीमित अधिकारिता केवल तब व्युत्पन्न होती है जब कोई उच्च न्यायालय अपने समक्ष के किसी मामले का निर्णय करने के बाद इस आशय का प्रमाणपत्र दे कि इसमें संशोधन के निर्वचन से संबंधित प्रश्न अन्तर्वलित है।

ऽसं. स. (वि.) खंड II, 9 दिसम्बर, 1947, पृष्ठ 1546

ऽऽसं. स. (वि.) वा., खंड II, 11 दिसम्बर, 1947, पृष्ठ 1708-11