328 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्रीमती दुर्गाबाईः क्या मैं यह प्रश्न पूछ सकती हूँ? क्या यह केवल प्रारूप तैयार करने का प्रश्न है या विधि में सारतत्व बदलने का।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं उस पर आ रहा हूँ। कृपया जल्दबाजी न करें।
इसलिए विधि मंत्रालय का सामान्य कार्य इतना भारी है कि इसे पूरा करना बहुत मुश्किल है। यह देखना कि विधि, संविधान के अनुरूप है या नहीं एक असाधारण कार्य है। और यह एक नया कार्य है जो विधि मंत्रालय को सौंपा गया है। पर इस नये काम को निपटाने के लिए कर्मचारी नहीं दिये गये। इसलिए विधि मंत्रालय की आलोचना करते समय भी सदन को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए।
यह अनुकूलन का काम दो प्रवर्गों में आता है। कुछ अनुकूलन तो मात्र औपचारिक होते हैं। उदाहरणार्थ, वर्तमान विधियों में जिस अभिव्यक्ति का प्रयोग किया गया है वह है, ‘प्रान्तीय सरकार’। परन्तु आजकल जिस अभिव्यक्त का प्रयोग किया गया है वह है, ‘सरकार’। ये तो औपचारिक संशोधन हैं जो किये जा चुके हैं और उनमें से शायद ही कोई बचा हो। परन्तु दूसरा अनुकूलन कार्य, अर्थात् वर्तमान विधियों को संविधान के उपबंधों के अनुरूप बनाने के लिए, सारवान उपान्तर करना उस औपचारिक कार्य से सर्वथा भिन्न है, जिसका उल्लेख मैं ऊपर कर चुका हूँ।
अब हम इस बात पर विचार करते हैं कि देश की वर्तमान विधियों में उन्हें संविधान के उपबंधों के अनुरूप बनाने की दृष्टि से सारवान उपांतर करने के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाये। इसके लिए केन्द्र में एक ऐसा अधिकारी होना चाहिये, जो राज्यों और केन्द्र द्वारा बनाये गये अधिनियमों में यह नोट करे कि क्या वर्तमान विधियों में कोई ऐसी बात है जिस पर अनुकूलन की दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है। उसके बाद क्या उस अधिकारी के नोट में कोई सारवान बात है या नहीं, इसकी आगे जांच करने के लिए मामले को विधि मंत्रालय के पास भेजा जाना चाहिए। यहीं यह मामला समाप्त नहीं हो जाता। उसके बाद विधि मंत्रालय और राज्यों के विधि अधिकारियों के बीच यह जानने के लिए पत्रव्यवहार होना चाहिए कि क्या वे इस बात से सहमत हैं कि उनकी कतिपय विधियां संविधान के उपबंधों के अनुरूप नहीं हैं। यदि वे सहमत होते हैं तो कार्यवाही की जा सकती है। परन्तु यदि वे सहमत नहीं होते तो मामले को राज्य के महाधिवक्ता और भारत सरकार के अटार्नी-जनरल के पास भेजना होगा, क्योंकि इस मामले में वे ही सरकार के अन्तिम सलाहकार हैं और उन्हीं की सलाह पर सरकार कार्यवाही कर सकती है। प्रान्तों में अधिनियमों की संख्या बहुत है_ राज्यों ने बहुत अधिनियम बनाये हैं। इस प्रक्रिया में कितना समय लगेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। तब केन्द्रीय सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंच सकती है कि क्या किसी विधि विशेष को अवैध घोषित