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किए जाने या उसे संविधान के अनुरूप बनाने के लिए उसके कुछ अंशों में उपांतर किये जायें और तदनुसार राष्ट्रपति एक आदेश जारी कर सकते हैं। यह बड़ी ही लम्बी-चौड़ी और दुःसाध्य प्रक्रिया है।
आखिरकार, राष्ट्रपति इस मामले में क्या हैं? राष्ट्रपति एक कानून बनाने वाला प्राधिकारी है। उसका प्राधिकार भी संसद के प्राधिकार के साथ ही रहता है। उक्त प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए हमने राष्ट्रपति को यह विशेष शक्ति सौंपी है। मुझे विश्वास है कि कानून बनाने की हमारी इतनी महत्वपूर्ण शक्ति का प्रयोग जल्दबाजी में नहीं किया जा सकता और किसी प्रकार का परिवर्तन करना, हो सकता है एकदम अनुपयुक्त और अनुचित हो। इन्हीं कारणों से विधि मंत्रालय यह कार्य पूरा न कर सका और इसीलिए मंत्रालय का विचार है कि हमें एक वर्ष और लग सकता है। यह भी याद रखना चाहिए कि विधि मंत्रालय पिछले तीन महीनों से चुनावों, दो लोक-प्रतिनिधित्व विधेयक तैयार करने, निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, आदि से संबंधित राष्ट्रपति के आदेश् में प्रस्तावित संशोधनों पर विचार करने के कार्य में व्यस्त था। वह चुनाव संबंधी नियम बनाने आदि के काम में भी व्यस्त रहेगा और यह सभी मामले इस समय विधि मंत्रालय के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। मंत्रालय में कर्मचारियों की कमी है और मुझे नहीं लगता कि अनुच्छेद 372 के उद्देश्य को पूरा करने के लिए कहीं से भी अतिरिक्त कर्मचारी दे सकेंगे और कार्यालय इस कार्य को करने के लिए समय निकाल सकेगा। इसलिए और समय की आवश्यकता है। और इसीलिए यह संशोधन लाया गया है।
मेरे मित्र चौधरी रणबीस सिंह ने इस घोषणा के बारे में जो बात कही है कि पंजाब भूमि अन्यंसक्रामण अधिनियम अमान्य है और संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं है। मुझे यह कहना है कि उन्होंने यह बात उठाई थी कि भारत सरकार ने वहां लागू समूचे विधान को रद्द करके ठीक नहीं किया। विधि मंत्रालय में इस बात पर भी विचार किया गया था कि क्या उस अधिनियम के कुछ उपबंधों में उपांतर करके और बाकी को ज्यों की त्यों रहने देने से काम नहीं चलेगा। परन्तु मैं सदन को यह बताना चाहता हूँ कि जहां तक इस अधिनियम का संबध है, यहाँ के महाअधिवक्ता और पंजाब सरकार के विधि अधिकारी इस बात से समहत थे कि उस अधिनियम का प्रत्येक उपबंध संविधान के अनुरूप नहीं है। इसलिए हमारे पास समूचे अधिनियम को अवैध घोषित करने के अलावा और कोई चारा नहीं था।
मैंने इस संशोधन के औचित्य को सदन को बता दिया है और मैं आशा करता हूँ कि सदन मेरे स्पष्टीकरण से संतुष्ट होगा।
श्री कॉमथः विधि मंत्रालय की सहायता करने हेतु इस सदन की एक समिति बनाने के सुझाव के संबंध में आपके क्या विचार हैं?