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इन दो शर्तों के पूरा हो जाने पर ही, अर्थात् इसमें संविधान के निर्वचन से संबंधित कोई मुद्दा विद्यमान हैः और दूसरे जब उच्च न्यायालय यह प्रमाणपत्र दे दे कि धारा 205 के अधीन फ़ेडरल न्यायालय में अपील की जा सकती है।
इस परिसीमा का परिणाम यह है कि उच्च न्यायालय से ऐसी सभी अन्य अपीलें, जिनमें संविधान से भिन्न विधियों के निर्वचन से संबंधित प्रश्न है अथवा ऐसी अपीलें जिनमें संविधान के निर्वचन से संबंधित प्रश्न तो है किंतु उच्च न्यायालय ने प्रमाणपत्र नहीं दिया है, फ़ेडरल न्यायालय के किसी हस्तक्षेप के बिना सीधे प्रिवी कौंसिल में चली जाती है।
इस विधेयक का उद्देश्य उच्च न्यायालयों से अपीलों को सीधे प्रिवी कौंसिल में जाने से रोकना है। दूसरे शब्दों में, विधेयक का उद्देश्य इस बात को अनिवार्य बनाना है कि उच्च न्यायालय के निर्णय या डिक्री से उत्पन्न सभी सिविल अपीलें, पहले फ़ेडरल न्यायालय में फ़ाइल की जाएँ।
इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए विधेयक द्वारा अपनाई गई पद्धति निम्नानुसार हैः
विधेयक का सबसे पहला काम है एक दिन नियत करना, जो पहली फ़रवरी है और इसे विधेयक में फ्नियतय् दिन कहा गया है। विधेयक में दूसरी बात यह है कि नियत दिन के बाद कोई भी अपील सीधे प्रिवी कौंसिल में नहीं जाएगी, जब तक कि वह अपील फ्लंबित अपीलय् की कोटि के अंतर्गत न आती हो। यदि किसी अपील को फरवरी के पहले दिन इस विधेयक के निबंधनों के अंतर्गत फ्लंबित अपीलय् के रूप में वर्णित किया जा सके तो उस अपील की सुनवाई और निर्णय प्रिवी कौंसिल द्वारा किए जाते रहेंगे। किंतु यदि उक्त दिन को वह अपील इस विधेयक की परिभाषा के अंतर्गत फ्लंबित अपीलय् नहीं हैं तो फ़ेडरल न्यायालय की अधिकारिता ऐसी अपील पर विस्तारित होती है, क्योंकि ऐसी अपील की सुनवाई और निर्णय करने का अधिकार फ़ेडरल न्यायालय को प्राप्त है।
विधेयक की धारा 7 बताती है कि फ्लंबित अपीलय् क्या है। अभी इस प्रयोजन के लिए इस विधेयक में एक काम चलाऊ और बने बनाए नियम को अपनाया गया है। नियम यह है कि यदि किसी अपील के अभिलेख उच्च न्यायालय द्वारा प्रिवी कौंसिल को नियत दिन या नियत दिन के पूर्व भेज दिए जाएं तो वह अपील लंबित अपील होगी और प्रिवी कौंसिल उस अपील की सुनवाई करने की अपनी अधिकारिता का प्रयोग करती रहेगी, यद्यपि वह एक सीधी अपील है।
दूसरी ओर, यदि अपील ऐसी स्थिति में है कि अभिलेख नहीं भेजे गए हैं तो अपील स्वतः प़ेQडरल न्यायालय को अंतरित हो जाती है और फ़ेडरल न्यायालय को अपील की सुनवाई करने का अधिकार मिल जाता है।