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ऐसा ही एक राज्य है। कुर्ग में भी केवल एक ही सीट आबंटित की गई है। इसलिए ऐसे मामलों में जहां अनुसूचित जातियों को एक सीट आबंटित करने से आम जनता को प्रतिनिधित्व से वंचित होना पड़ेगा, वहां आरक्षण के सिद्धांत को लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए भाग-ग राज्यों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रतिनिधित्व का उपंबंध करते समय हमें उन राज्यों को चुनना होगा, जहां लोकसभा में दोनों को प्रतिनिधित्व मिल सके।
दूसरा सिद्धांत जो हमें ध्यान में रखना था वह यह था कि किसी विशेष भाग-ग राज्य में अनुसूचित जातियों और जनजातियों की जनसंख्या कुल कितनी है। जहां जनसंख्या बहुत कम है वहां हमने प्रतिनिधित्व देना ठीक नहीं समझा। किन्तु जहां जनसंख्या अधिक है वहां हमने उन क्षेत्रों में एक सीट देना ठीक समझा। अतः यह विधेयक दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और विन्ध्य प्रदेश में, अर्थात् इन तीनों भाग-ग राज्यों में प्रत्येक के लिए एक-एक सीट आरक्षित करता है। हमने यह महसूस किया है कि ये राज्य अनुसूचित जातियों को एक सीट दे सकते हैं।
अनुसूचित जनजातियों के बारे में, हमने मणिपुर और विन्ध्य प्रदेश को चुना है। वहां भी ऐसा नहीं लगता कि अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण करने से आम जनसंख्या के साथ कोई अन्याय होगा। मणिपुर में दो सीटें दी गई हैं। इस विधेयक में यह प्रस्ताव किया गया है कि अनुसूचित जातियों के लिए एक सीट आरक्षित की जाये, क्योंकि वहां अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या बहुत अधिक है। दूसरे, हम विन्ध्य प्रदेश में, जहां छह सीटें हैं अनुसूचित जनजातियों को एक सीट देना चाहते हैं। बाकी राज्यों को न तो अनुसूचित जातियों के लिए और न ही अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई प्रतिनिधित्व दिया जायेगा।
अब मैं अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अनुसूची के प्रश्न पर आता हूँ। मैं यह कहना चाहूंगा कि इस विलय में मेरी अपनी राय कुछ भी नहीं है। ये जातियां हमें गृह विभाग और जनगणना आयुक्त ने, जिसने इस विषय की नवीनतम जांच की है, बताई है।
(श्रीमती दुर्गाबाई पीठासीन हुई)
मैं आशा करता हूँ कि विधेयक में जो सूची दी गई है, वह व्यापक है और ऐसी किसी भी जाति को जो या तो अनुसूचित जातियों में या अनुसूचित जनजातियों में शामिल है, छोड़या नहीं गया है। परन्तु मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मैं इस विधेयक की आवश्यकता को नहीं समझ सका।
श्री सोनावाने (बम्बई)ः आप कभी भी नहीं समझेंगे।