374 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री जे.आर. कपूरः मुझे यह विधेयक एकदम अनावश्यक लगता है। मुझे खेद है कि जो बहुमूल्य समय हम इस विधेयक पर विचार करने में बरबाद कर रहे हैं, वह हमें कई अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों पर, जो हमारे सामने लम्बित हैं, विचार करने के लिए लगाना चाहिये था। मैं आपको बताऊंगा कि मैंने ऐसा क्यों कहा और मैं आशा करता हूँ कि मैं अपने उस माननीय मित्र को आसानी से समझा सकूंगा जिसने मुझे बीच में अधीर होकर रोका है। हमारे पास समय कम है। हमारे लिए इस प्रकार के विधान में समय बरबाद करना अनुचित होगा।
इस विधेयक में आखिरकार क्या व्यवस्था की जा रही है? पहले तो, इसमें लोक सभा में अनुसूचित जातियों ओर अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों के आरक्षण की व्यवस्था की जा रही है। दूसरे, इसमें यह बताया जा रहा है कि कौन-सी जातियां अनुसूचित जातियां हैं और कौन-सी अनुसूचित जनजातियाँ हैं। यदि आप संविधान के अनुच्छेद 330 को देखें, तो आपको स्पष्ट हो जायेगा कि संविधान में ही अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण की विनिर्दिष्ट रूप में व्यवस्था की गई है। अनुच्छेद 330 में कहा गया हैः
फ्(1) लोक सभा मेंµ
(क) अनुसूचित जातियों के लिए,
(ख) असम के स्वशायी जिलों की अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर अन्य अनुसूचित जनजातियों के लिए और
(ग) असम के स्वशासी जिलों की अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित रहेंगे।
अनुच्छेद 330 का पैरा (2) इस प्रकार हैःµ
(2) किसी भी राज्य में आरक्षित सीटों की संख्याय्µ
भाग-क राजय या भाग-ख राज्य में नहीं, किंतु किसी भी राज्य में जिनके अन्तर्गत भाग ‘ग’ राज्य भी शामिल हैंµ
फ्खंड (1) के अधीन अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए उस राज्य को आबंटित सीटों की कुल संख्या के निकटतम उसी अनुपात में होगी...य्
मुझे बाकी पढ़ने की जरूरत नहीं है। मेरी दलील यह है कि इस अनुच्छेद 330 में स्पष्ट रूप से यह उपबंध किया गया है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए किसी भी राज्य के संबंध में लोक सभा में स्थान आरक्षित किये जायेंगे। संविधान के अनुच्छेद 1 में ‘राज्य’ शब्द की परिभाषा इस प्रकार दी गई हैः-