34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 391

376 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि कितनी सीटें अनुसचित जातियों को और कितनी अनुसूचित जनजातियों को आबंटित की जायंगी। इसमें सन्देह नहीं है कि अनुच्छेद 330 के उप-खंड (2) में सीटों के आरक्षण के लिए फार्मूला दिया गया है कि यह उस राज्य में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या के अनुसार होगा। यह उचित है और समझ में आता है। किन्तु यहां संख्या को स्पष्ट रूप से निश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। स्पष्टतः भाग-क और भाग-ख राज्यों के मामले में यह कार्य निर्वाचन आयुक्त पर छोड़ा गया है। परन्तु यह माननीय विधि मंत्री या यह सभा यह कार्य स्वयं करना चाहती है, जब कि सामान्यतया यह निर्वाचन आयुक्त को सौंपा जाना चाहिए। मुझे सभा द्वारा यह अधिकार लिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है। परन्तु मैं यह महसूस करता हूँ कि यह विधान का गलत तरीका है। मान लीजिये पांच साल बाद इन सभी भाग-ग राज्यों में अनुसूचित जातियों और अनुसचित जनजातियों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाती है और अनुच्छेद 330 के अनुसार उन्हें एक या दो सीटों से भी जिनकी आप इस समय व्यवस्था कर रहे हैं, अधिक सीटें चाहिए तो क्या होगा? तब वे अधिक सीटों के इकदार होंगे, परन्तु यह विधेयक उनके आड़े आयेगा। इसलिए मेरा निवेदन यह है कि यह खंड सोच-विचार कर नहीं लाया गया है, क्योंकि यह पहले तो हमें अनावश्यक रूप से सीटें आरक्षित करने के लिए कहता है फिर हमें कुछ निश्चित सीटों के लिए बाध्य करता है।

दूसरे, इस विधेयक में उन अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के नाम बताने का प्रयास किया जा रहा है। जिन पर यह निर्धारित करने के लिए विचार किया जायेगा कि कितनी आरक्षित सीटों के लिए उपबंध किया जाये। यहां मैं फिर बता दूं कि संविधान में इसके लिए भी पर्याप्त व्यवस्था है। यह कार्य राष्ट्रपति द्वारा एक अधिसूचना जारी करके किया जा सकता है। अनुच्छेद 341 में उपबंध हैः

फ्राष्ट्रपति, किसी राज्य के संबंध में वहां के राज्यपाल अथवा राजप्रमुख से परामर्श करने के पश्चात्, अधिसूचना द्वारा उन जातियों, मूलवंशों या जनजातियों, अथवा जातियों, मूलवंशों या जनजातियों के भागों या उनकी उपजातियों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिन्हें हम संविधान के प्रयोजनों के लिए उस राज्य के संबंध में

श्री जे.आर. कपूरः मेरे माननीय मित्र ने मुझे जो प्रोत्साहन और समर्थन दिया है, उसके लिए मैं उनका आभारी हूँ। विधि मंत्री ऐसा अनावश्यक विधान क्यों लाए, इसका कारण जानने की मैं कोशिश कर रहा हूँ। यह कारण मैं आसानी से जान सकता हूँ। दो दिन पहले मैंने समाचार-पत्रों में प्रकाशित उनका एक भाषण पढ़ा था जो उन्होंने किसी भवन का शिलान्यास करते समय दिया था। उन्होंने बड़ा साहस दिखाया था।

डॉ. देशमुखः मैं हैरान हूँ कि क्या यह सुसंगत है।