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माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह विधेयक उस भाषण से बहुत पहले पुरःस्थापित किया जा चुका था।
श्री जे.आर. कपूरः मैं कोई असंगत बात नहीं करूंगा। मैं इस सदन के माननीय सदस्यों को यह समझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि यह विधेयक एकदम अनावश्यक है। फिर माननीय सदस्यों के दिमाग में यह प्रश्न उठेगा कि डॉ. अम्बेडकर जैसे जाने-माने विधिवेत्ता और वकील हमें यह अनावश्यक विधान अधिनियमित करने के लिए क्यों कह रहे हैं। मुझे यह सिद्ध करना है कि वह इस विधान को, कोई आवश्यकता या औचित्य के साथ लेकर हमारे सामने नहीं लाये, बल्कि किन्हीं बाहृय कारणों से वह हमारे समक्ष लाये हैं......
माननीय अध्यक्षः क्या माननीय सदस्य यह कहना चाहते हैं कि यह डॉ. अम्बेडकर का विधेयक है? यह तो सरकारी विधेयक है।
श्री जे.आर. कपूरः तकनीकी तौर पर यह सरकार का विधेयक है, परन्तु मुझे हैरानी है कि क्या सरकार ने या उनके दूसरे सहयोगियों ने इस विधेयक पर वास्तव में अपना दिमाग लगाया है (कई माननीय सदस्यः ओह! ओह!) मैं तो डॉ. अम्बेडकर की प्रशंसा कर रहा हूँ कि वह अपने सहयोगियों को यह मानने के लिए आसानी से राजी कर सके कि इस जैसा विधान भी आवश्यक है और उन्हें विधेयक की बारीकियों के पचड़े में नहीं पड़ना चाहिये तथा उनकी योग्यता और बुद्धिमत्ता पर आंख मूंद कर विश्वास करना चाहिए।
माननीय अध्यक्षः क्या माननीय सदस्य उन सदस्यों में से एक नहीं है जिन्होंने इस विधेयक को लाने के लिए सहमति दी थी?
श्री जे.आर. कपूरः मेरे विचार में इस सदन की यह प्रथा रही है कि कोई भी सदस्य किसी विधेयक के पुरःस्थापन का विरोध नहीं करता। मैं खुश होऊंगा। यदि आज के बाद इस प्रथा को न माना जाये और इस सदन के माननीय सदस्यों को विधेयक की पुरःस्थापन का भी विरोध करने दिया जाये। महोदय, मैं आशा करता हूँ कि आप मुझे अपना भाषण जारी रखने से महज इस कारण नहीं रोकना चाहेंगी कि चूंकि मैंने इस विधेयक की पुरःस्थापन का विरोध नहीं किया था, इसलिए मैं अब इसका विरोध नहीं कर सकता।
मेरा निवेदन है कि यह विधेयक एक मात्र चुनावी करतब है, जिसका माननीय डॉ. अम्बेडकर पूरा लाभ उठाना चाहते हैं। वह हमें और बाहरी दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि वही अकेले अनुसूचित जातियों के सच्चे हमदर्द हैं और संविधान निर्माता भी उस समय इतने सजग नहीं थे और इस सदन के उन माननीय सदस्यों ने भी जो अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस बात को भी नहीं सोचा