382 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पेश किया गया था, चुप्पी साधे रहे। इसलिए यदि वह उन लोगों के प्रतिनिधित्व के बारे में अब कोई विधेयक लाते हैं तो इस सदन के किसी भी सदस्य को इसका विरोध नहीं करना चाहिए। जैसा कि हम जानते हैं इन केंद्र शासित क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों के लोगों की संख्या लगभग 15 से 20 लाख हैं। मैंने एक संशोधन पेश किया है कि यहां उनका प्रतिनिधित्व नहीं है जैसे कुर्ग, अजमेर और त्रिपुरा में, वहां उन्हें प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। इन स्थानों पर अनुसूचित जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची तक में शामिल नहीं किया गया है। मैं नहीं जानता कि मंत्री मेरे संशोधन स्वीकार करेंगे या नहीं और इन लोगों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करेंगे या नहीं। मैं यह नहीं कहता कि ये लोग जहां भी हैं, उन्हें परिषदों, विधानसभाओं और संसद में अवश्य प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। यह मेरी मांग नहीं है। यदि उन्हें उनकी जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा सकता, तो न दें। परन्तु यदि दिया जा सकता है तो अवश्य दें और यदि आप उनके साथ न्याय करना चाहते हैं तो उन्हें कम से कम अनुसूचित जातियों की सूची में तो शामिल कर लें, ताकि शिक्षा, सेवाओं, स्थानीय विवादों के प्रतिनिधित्व तथा पेय जल आदि की सुविधायें इन लोगों को भी जा सकें। यही मेरा कहना है मेरी राय में केन्द्रीय सरकार ने इन लोगों के साथ कोई न्याय नहीं किया है। इसकी जिम्मेदारी हमारे मंत्रिमंडल के दो हरिजन मंत्रियों पर अधिक है और मैं विशेष रूप से डॉ. अम्बेडकर का नाम लेना चाहूंगा जो अपने भाषणों में सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि संसद में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोग कोई काम नहीं कर रहे हैं। मेरे विचार में डॉ. अम्बेडकर का यह दृष्टिकोण उचित नहीं है। अतः, जब हम लोकतंत्र में काम कर रहे हैं और हमारे संविधान में सभी को वयस्क मताधिकार प्राप्त है, तो यदि केंद्र शासित क्षेत्रों में इन भाग्यहीन लोगों को भी वयस्क मताधिकार और प्रतिनिधित्व मिल जाता है, तो इसमें आपत्ति की कौन-सी बात है और इसके खिलाफ कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई सदस्य इसका विरोध करता है, तो मैं यह कहूंगा कि वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सिद्धांतों के विरुद्ध काम कर रहा है।
इस सदन में इन लोगों के प्रतिनिधित्व के बारे में मैं यह कहूंगा कि उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। उन्हें केवल इसी सभा में प्रतिनिधित्व मिल सकता है, क्योंकि केंद्र शासित क्षेत्रों में कोई दूसरी सभा तो स्थापित होगी नहीं। दिल्ली की आबादी 15 लाख है और इसके इस सदन में तीन प्रतिनिधि हैं। केंद्र शासित क्षेत्रों में इन लोगों की संख्या लगभग 20 लाख है और उनके और यहां तीन प्रतिनिधि हैं। अर्थात् 5 लाख लोगों के लिए एक प्रतिनिधि के हिसाब से उनका एक प्रतिनिधि और होना चाहिये। फिर भी लोग कहते हैं कि यह विधेयक इन लोगों को, जिनकी केंद्र शासित क्षेत्रों में संख्या कम है, प्रतिनिधत्व देने के लिए लाया गया है।
अंत में, मैं केवल यहीं कहूंगा कि कुछ अन्य जातियां और समुदाय हैं जो अनुसूचित