5. फेडरल न्यायालय (अधिकारिता का विस्तार) विधेयक - Page 40

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की शक्तियां प्राप्त हैं अर्थात् सामान्य विधायी शक्तियां और सांविधानिक शक्तियां भी, मुझे इसकी जानकारी नहीं है कि कहीं कोई अन्य सभा, जिसके पास लिखित संविधान है, ऐसी शक्तियां रखती हो कि वह इस विशिष्ट विधानमंडल को सृजित करने वाले संविधान की अवहेलना कर सके। अतः मेरा निवेदन है कि मेरी स्थिति पूर्ण रूप से मजबूत और स्थिर है जब मैं यह कहता हूँ कि इस विधेयक के उपबंधों को क्रियान्वित करने के लिए हमें कुछ ऐसी परिसीमाओं द्वारा आबद्ध होना पड़ेगा जो यथा अनुकूलित भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा इस विधानमंडल पर अधिरोपित की गई हैं।

अब मैं दूसरी आलोचना पर आता हूँ जिसे मेरे माननीय मित्र अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर द्वारा व्यक्त किया गया था। उनके संशोधन के संबंध में, मैं यह नहीं कहना चाहता कि मुझे खेद है कि मैं उनका संशोधन स्वीकार नहीं कर सकता। मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि मेरे द्वारा स्थिति की परख के अनुसार यह संशोधन संभवतः अनावश्यक है ओर मैं यह स्पष्ट करूंगा कि मैं इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँचा। उनके द्वारा संशोधन के लिए जिस आधार पर बल दिया गया वह यह है कि, उनके अनुसार, 1940 में निर्णीत एक मामले में प्रिवी कौंसिल ने कहा था (जैसा कि पंजाब सहकारी बैंक बनाम आयकर आयुक्त में रिपोर्ट किया गया है।) कि यदि उच्च न्यायालय के प्रमाणपत्र नहीं दिया है तो वे संविधान पर विचार करने से संबंधित किसी बिंदु पर विचार नहीं करेंगे। अतः प्रिवी कौंसिल ने कहा था कि वे मामले को_ प्रमाणपत्र के लिए उच्च न्यायालय के पास वापस भेज देंगे। उनका तर्क था कि इस मामले में प्रिवी कौंसिल के निर्णय को भी फ़ेडरल न्यायालय द्वारा अपने ऊपर आबद्धकर स्वीकार किया जा सकता है_ और इसीलिए जब भी प्रमाणपत्र न दिया जाए और मामला प्रिवी कौंसिल के समक्ष आए और वास्तव में यह पाया जाए कि संविधान से संबंधित कोई प्रश्न उत्पन्न हुआ हैµतो प्रिवी कौंसिल स्वयं को इस अपील पर विचार करने में असमर्थ पाएगी। मेरे विचार से उनके तर्क का यही निष्कर्ष और सार था। अब मैं यह बताना चाहता हूँ कि उन्होंने निर्णय में उस से कुछ अधिक ही पढ़ लिया है जो वास्तव में प्रिवी कौंसिल के निर्णय में कहा गया है। मैं निर्णय से कुछ पंक्तियाँ पढूँगा। उन्होंने तीन प्रतिपादनाएं बताई हैं, जो उनके अनुसार धारा 205 के विचारण में पैदा होंगी। इनमें से केवल दूसरी प्रतिपादन ऐसी है जो हमारे प्रयोजन के लिए संगत हैः

फ्दूसरे, यदि प्रमाणपत्र के अभाव में, किसी अपील पर बोर्ड को ऐसा प्रतीत हो कि इस बात पर विचार किए जाने के लिए आधार है कि यह मामला उच्च न्यायालय के विचार के लिए है और उन्हें प्रमाणपत्र देना चाहिए था या उसे रोक लेना चाहिए था, तो बोर्ड को उस अपील की सुनवाई करने से इन्कार कर देना चाहिए जब तक कि उच्च न्यायालय को एक या अन्य बात करने का अवसर प्राप्त न हो जाए।य्

प्रिवी कौंसिल ने यही निर्धारित किया है। अब मेरा निवेदन यह है कि वस्तुतः इस विधेयक के प्रारूपण के समय विभाग द्वारा इस मामले पर विचार किया गया था एवं यह