26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
महसूस किया गया था कि प्रिवी कौंसिल द्वारा व्यक्त किए गए विचारों में अंततः यह नहीं कहा गया था कि ऐसे मामलों में उन्हें अधिकारिता प्राप्त नहीं है। उन्होंने केवल एक प्रकार का प्रज्ञा का नियम अधिकथित कर दिया है कि यदि कोई ऐसा मामला आता है जिसके संबंध में कोई प्रमाणपत्र नहीं है तो वे इस पर प्रत्यक्षतः विचार नहीं करेंगेµइसलिए नहीं कि उनके पास उस पर विचार करने की शक्ति नहीं हैµबल्कि वे मामला उच्च न्यायालय को वापस भेज देंगे। अतः इसका अर्थ यह नहीं कि फ़ेडरल न्यायालयों को, जो विधेयक के अधीन प्रिवी कौंसिल की अधिकारिता विरासत में प्राप्त करेंगे, कोई अधिकारिता प्राप्त नहीं होगी क्योंकि प्रिवी कौंसिल ने ऐसा कोई नियम अधिकाथित ही नहीं किया है।
मेरा दूसरा निवेदन है कि यदि यह मान लिया जाए कि प्रिवी कौंसिल की अभ्युक्ति अधिकारिता के प्रश्न से संबंधित है, जो क्या हमारे लिए यह उपधारणा करना आवश्यक है कि फ़ेडरल न्यायालय, नई अधिकारिता का प्रयोग करते हुए जो हम उसे दे रहे हैं, वह स्वीकार करेगा जो प्रिवी कौंसिल द्वारा अधिकथित किया गया है? फ़ेडरल न्यायालय अपना स्वयं का निर्वचन करने के लिए स्वतंत्र होगा। वह यह कह सकता है कि इस बात के होते हुए भी कि प्रमाणपत्र नहीं दिया गया है, हम इस प्रश्न पर विचार करेंगे और उसका विनिश्चय करेंगे।
तीसरे, प्रिवी कौंसिल को विशेष इजाज़त देने की शक्ति भी प्राप्त है और वह विशेष इजाज़त देकर कठिनाई को दूर कर सकती है। मैं सदन को यह स्पष्ट करने का प्रयास कर रहा हूँ कि हमने उस प्रकार का उपबंध सम्मिलित नहीं किया है जो मेरे मित्र श्री अल्लादि कृष्णस्वामी, ने अपने संशोधन में रखा है। परंतु, यदि इस सदन में मौजूद प्रतिष्ठित वकीलों का यह विचार है कि हमें इस प्रश्न को संदेह में नहीं छोड़ना चाहिए था और मेरा निष्कर्ष है कि उन्हें मेरे मित्र बख़्शी टेक चन्द का समर्थन प्राप्त है और मैं भी संशोधन पर कोई आपत्ति नहीं करूंगा यदि वे इस बात पर जोर दें कि संशोधन विधेयक में शामिल किया जाए।
फिर, अजमेर-मारवाड़ और कुर्ग के न्यायिक अयुक्तों के न्यायालयों के संबंध में प्रश्न उठाया गया। यह पूर्णतया सत्य है कि यह बहुत ही असामान्य होगा कि हम उच्च न्यायालय से प्रिवी कौंसिल में प्रत्यक्ष अपीलों को रोक दें और न्यायिक आयुक्तों के विरुद्ध अपीलों को प्रिवी कौंसिल में, फ़ेडरल न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना, जाने दें। यह अनियमितता स्पष्ट है और कोई भी इसे इनकार नहीं कर सकता। किंतु प्रश्न यह है किः जब तक हम न्यायिक आयुक्तों के न्यायालयों को उच्च न्यायालय के रूप में घोषित न कर दें, तब तक हम इस विधेयक को उन पर आबद्धकर नहीं बना सकते। अब मुझे यह बताया गया है कि न्यायिक आयुक्तों के न्यायालयों को उच्च न्यायालयों के रूप में घोषित किए जाने के प्रश्न के संबंध में कतिपय प्रशासनिक कठिनाइयां हैं। उदाहरण के लिए, उच्च न्यायालयों से संबंधित भारत शासन अधिनियम में सभी उपबंधों