390 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है तो वह अनुच्छेद 342 के खंड (2) के अंतर्गत है। उस उपबंध के अंतर्गत, उस उपांतरण परिवर्तन की व्याप्ति सीमित है। यह सीमा यह है कि यदि राष्ट्रपति खंड (1) के अंतर्गत कोई सूची तैयार करते हैं, तो उसी सूची में संसद के किसी अधिनियम द्वारा कोई उपांतरण किया जा सकता है। अन्यथा, सूची में कोई परिवर्तन करने या यह उपबंध करने के लिए कि कुछ जातियों को अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों में शामिल किया जाये या नहीं, कोई स्वतंत्र उपबंध नहीं है। अतः जहां तक उस उपबंध का संबंध है, मेरे विचार में यह विधेयक हमारी कोई सहायता नहीं करेगा, क्योंकि राष्ट्रपति द्वारा ऐसी कोई सूची तैयार नहीं की गई है, जिसमें इस प्रकार का उपांतरण किया जा सके। इसलिए मेरा निवेदन है कि जिन दो बातों को लेकर यह विधेयक लाया गया है, उनको देखते हुए यह विधेयक या तो अनावश्यक है या अधिकारातीत है। चूंकि इस सभा में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के प्रतिनिधित्व के लिए संविधान के अनुच्छेद 330 में पहले ही उपबंध कर दिया गया है, इसलिए इस विधेयक को पारित करना या इस सदन में ऐसा कोई कानून बनाना एकदम अनावश्यक है।
माननीय अध्यक्षः श्री मूलदास वैश्य।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं एक अनुरोध करना चाहता हूँ। मैं नहीं जानता कि पं. मुनीश्वर दत्त उपाध्याय ने जो दलील दी है, उसे अन्य सदस्य भी दोहराएंगे, जैसा कि कल हुआ था। यदि ऐसी बात है तो आपकी अनुमति से मैं यह बताना चाहूंगा कि सांविधानिक स्थिति वास्तव में क्या है। परन्तु मैं यह बात आप पर छोड़ता हूँ। अन्यथा, मैं इस मामले से उसी समय निपटूंगा जब मेरी बारी आयेगी।
माननीय अध्यक्षः मेरे विचार से यह बेहतर रहेगा। मैं स्वयं उनकी आपत्ति को नहीं समझ पाया हूँ।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः वे एक खास बात को नहीं समझा पाये हैं जिसकी वजह से वे हर तरह की आपत्ति कर रहे हैं।
श्री भारती (मद्रास)ः वह कल भी की गई थी।
माननीय अध्यक्षः फिर वह तर्क दोहराया नहीं जाना चाहिए और विधि मंत्री उसका अंत में उत्तर देंगे।
श्री सिधवा (मध्य प्रदेश)ः उन्हें अब उत्तर देने दीजिये।
माननीय अध्यक्षः मैं पुनरावृत्ति के कारण इस तर्क के लिए अनुमति नहीं देता।
श्री एथराजुलू नायडू (मैसूर)ः मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि आप सांविधानिक स्थिति पर चर्चा को न रोकें, क्योंकि हो सकता है कि इसके दूसरे पहलू भी हों, जिन्हें पेश करना होगा।