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शब्द न कहें, जो हमारे समुदाय को कृतघ्न सिद्ध कर दें। उन्होंने अपने जीवन में बहुत से करतब दिखाये हैं और यह भी मेरे विचार में उनका एक करतब है। यह भी एक वैसी ही चालाकी हो सकती है जैसी भगवान श्री कृष्ण दिखाया करते थे। परमात्मा हमें चालबाजियों की इन लीलाओं से बचाओ। हम उस देश के प्रति कृतघ्न नहीं हो सकते, जिसमें हमने जन्म लिया है और जिसकी हमने पूरी योग्यता से सेवा की है। हमसे एक समय अपना धर्म-परिवर्तन करने के लिए कहा गया था। परन्तु हमने संसार को दिखा दिया कि हम किसी भी कीमत पर अपने देश के विरुद्ध कार्य नहीं करेंगे जहां हमारा जन्म हुआ है और हमने जिस धर्म को अपनाया है उसका त्याग नहीं करेंगे। हम अपने जीवन की बलि दे सकते हैं, परन्तु हम अपना धर्म नहीं छोड़ सकते। अतः अंत में मैं यही कहूंगा........
माननीय अध्यक्षः शान्ति, शान्ति। माननीय सदस्य अपने दिल की बात कहने के लिये बहुत उत्सुक है, परन्तु मुझे खेद है कि हम इस सभा में ऐसे विषय की शुरूआत करने जा रहे हैं, जिस पर हम सभा के बाहर अच्छी चर्चा कर सकते हैं। इस समय हमें इस विधेयक के संबंध में बोलना है। एक-दो बात यदि सभा को प्रभावित करने के लिए कही भी जाती है, फिर भी हमें चाहिये कि अनुसूचित जातियों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा हमें किसी राजनीतिक या अन्य विवाद में नहीं पड़ना चाहिये। ये विवाद सभा के बाहर चल सकते हैं। मैं प्रत्येक सदस्य से अनुरोध करूंगा कि वह इस विधेयक के बाहर न जाएं। मैं माननीय सदस्य के भाषण के बीच में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता था और न ही मैं उनके उत्साह को कम करना चाहता हूँ और उन्हें अब मामले के गुणवगुण तक ही सीमित रहना चाहिये। मैं देख रहा हूँ कि वे इस पर कब बोलेंगे।
श्री एम.वी. वैश्यः आपने इस संबंध में जो विनिर्णय किया है वह वास्तव में बहुमूल्य है और हम उसके अनुरूप आचरण करेंगे। परन्तु मुझे माननीय डॉ. अम्बेडकर से कुछ कहना है। उन्होंने जो विधेयक प्रस्तुत किया है वह सरकार की ओर से लाया गया है और वह अवश्य ही आवश्यक होगा। इसलिए यह हरिजन निस्संदेह उसका समर्थन करेंगे। परन्तु मुझे जो कहना था वह मैं संक्षेप में कह चुका हूँ। मैं आशा करता हूँ कि मैंने जो यहां कहा है उसके लिए वह मुझे माफ कर देंगे और आप भी मुझे माफ कर देंगे।
(श्रीमती दुर्गाबाई पीठासीन हुइंर्)
डॉ. देशमुख (मध्य प्रदेश)ः मेरे मित्र माननीय मंत्री बहुत जल्दी में हैं, परन्तु मुझे कुछ बहुत ही जरूरी बातें कहनी है। यह कोई एक या दो विशेष जाति की बात ही नहीं परन्तु यह सारा तरीका है जिसमें लोक-प्रतिनिधित्व, निर्वाचन संबंधी नियम और विनियमों को लिया जा रहा है, असन्तोषजनक है। हमने 1950 में एक विधेयक पारित किया था जो अब 1950 का अधिनियम संख्या 43 है। हम जानते हैं कि यह किस प्रकार प्रस्तुत