394 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किया गया था, और उपबंधों में संशोधन कराने तथा सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए इस सभा को कितनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी। तब हमने शीघ्र ही एक संशोधनकारी विधेयक पास किया था जो अब 1950 का अधिनियम संख्या 23 है और जिसके माध्यम से हमने राज्यसभा में भाग-ग राज्यों के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की थी। तब हमने कुछ समय तक कोई विधेयक पारित नहीं किया था, हालांकि इस समय सभा के सामने दो विधेयक लम्बित हैं परन्तु हमने राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से दो अधिसूचनाएं जारी कराई थीं। एक अधिसूचना 10 अगस्त, 1950 को और दूसरी 6 सितम्बर, 1950 को जारी की गई थी, जिनमें संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के अधीन अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के नामों की सूची दी गई थी। मेरी पहली शिकायत इन दोनों अनुच्छेदों 341 और 342 के अधीन सरकार द्वारा की गई कार्यवाही के बारे में है। अनुच्छेद 341 के दूसरे भाग के अंतर्गत राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से अधिसूचित सूची में उपांतर करके, उसमें कुछ जोड़ने या उसमें कुछ कम करने का अधिकार संसद को ही है। इन सूचियों को अधिसूचित करना बिल्कुल उचित और सांविधानिक था। परन्तु मैं महसूस करता हूँ कि माननीय मंत्री को इस सभा को भी इन अधिसूचनाओं में उल्लिखित सूचियों पर विचार करने तथा उनकी छानबीन करने का अवसर देना चाहिये था। मैं नहीं जानता कि माननीय विधि मंत्री ने अभ्यावेदन देखें भी हैं या नहीं, परन्तु मेरे पास बहुत सी जातियों के पत्र आये हैं, जिनमें शिकायत की गई है कि उन्हें इन सूचियों में शामिल नहीं किया गया है। राज्यों के एक विशेष वर्ग के लिए एक छोटा-सा विधेयक लाने के बजायµमैं इस विधेयक पर आपत्ति नहीं कर रहा हूँ बल्कि इसका समर्थन कर रहा हूँµयदि माननीय मंत्री इन दोनों सूचियों के संबंध में इस सभा के सदस्यों के लिए कोई ऐसा तरीका निकालते, जिसमें कि हम भी उन सूचियों की छानबीन कर सकते और लोगों को भी यह मालूम होता कि उनके अधिकारों की कहां तक रक्षा की जा रही है, तो बेहतर होता। यह लम्बी बहस और इस सभा के सदस्यों की उत्सुकता, मेरा विचार है, इसी तथ्य पर आधारित है। यदि सब कुछ व्यवस्थित होता और जहां तक भाग-क और ख राज्यों का संबंध है, यदि समुचित जांच होती जो कि हर मामले में बहुत आवश्यक हैµयह भाग-ग राज्यों के संदर्भ में अनुसूचित जातियों की अनुपूरक सूची हैµतो इस सभा में बहस बहुत कम होती। सदस्यों की उत्सुकता कम होती और हमारी शिकायतें भी ज्यादा नहीं होती। परन्तु यह सभी कुछ बड़े अजीब ढंग से किया जा रहा है और मैं आशा करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि इस प्रकार की चीजें नहीं होनी चाहिए।
हमें केवल एक समेकित कानून बनाना चाहिये जिनमें इन सब बातों की व्यवस्था होनी चाहिये। तब हर महीने सूची में कुछ घटाने या बढ़ाने के लिए संशोधन विधेयक लाने की आवश्यकता नहीं होगी। माननीय मंत्री से मैं सर्वप्रथम यह कहना चाहता हूँ कि इन अधिसूचनाओं के अधीन दी गई सूचियां पूर्ण नहीं हैं। बहुत-सी जातियों के लोग महसूस