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को न्यायिक आयुक्तों को उनके उच्च न्यायालय बनने के पूर्व लागू करना होगा। मुझे ऐसा लगता है कि इससे जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं और यही मुख्य कारण है कि हम ने इस अधिनियम के उपबंधों को इस समय न्यायिक आयुक्तों तक विस्तारित करना उपयुक्त नहीं समझा। जैसाकि मैं कह चुका हूँ, अंततः यह विधेयक अस्थायी अवधि का ही होगा। यह दो या तीन मास से अधिक अवधि के लिए प्रवृत्त नहीं होगा और मैं नहीं समझता कि इन दो या तीन मासों में न्यायिक आयुक्तों के न्यायालयों के विरुद्ध प्रिवी कौंसिल में बहुत बड़ी संख्या में अपीलें आने की संभावना है।
अतः मेरा निवेदन है कि इस सदन के लिए यह बेहतर होगा कि प्रशासनिक कारणों से उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों का सामना करने के बजाय इस विसंगति से ग्रस्त रहा जाए और स्थिति यथावत् रखी जाए।
जहां तक दांडिक अपीलों के प्रश्न का संबंध है, इस विषय का निपटारा मेरे मित्र द्वारा उचित रूप से कर दिया गया है जिन्होंने मुझसे पहले भाषण दिया था और मैं समझता हूँ कि इस विषय पर अब मुझे कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं है।
माननीय अध्यक्षः मैं केवल वही कहना चाहूँगा जो मैं संशोधन के बारे में महसूस कर रहा था। यदि माननीय विधि मंत्री इसे स्वीकार करने के लिए तैयार है तो क्या यह संभव नहीं है कि चूंकि फ्भारत शासन अधिनियम की धारा 205 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भीय् शब्दों का प्रयोग संशोधन में किया गया है, इसलिए इस विधानमंडल की सक्षमता पर आपत्ति की जाए?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः यह भी एक मुद्दा है।
माननीय अध्यक्षः अतः इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। अभी सदन उठ जाएगा और अंतराल में विधि मंत्री कृपया इस मुद्दे पर विचार करें।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः जी हाँ, में इस पर विचार करूँगा।
तब सभा दो बजकर तीस मिनट तक के लिए भोजन काल के लिए स्थगित हो गई।
सभा भोजन काल के पश्चात् दो बजकर तीस मिनट पर अध्यक्ष महोदय (माननीय श्री जी.बी. मावलंकर) की अध्यक्षता में पुनः समवेत हुई।
माननीय अध्यक्षः प्रश्न यह हैः
फ्कि सिविल मामलों में फ़ेडरल न्यायालय की अपीली अधिकारिता के विस्तार का उपबंध करने के लिए विधेयक पर विचार किया जाए।य्
प्रस्ताव अंगीकार किया गया।