34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 411

396 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि कोई ऐसा कार्य हो रहा है जो उनके अधिकारों को प्रभावित करता है। हो सकता है उनके अधिकार खतरे में पड़े जायें, क्योंकि हम इसमें बहुत जल्दबाजी कर रहे हैं। उस दृष्टि से मुझे हैरानी नहीं होगी यदि बहुत-सी जातियां सूचियों में शामिल होने से रह जायें और जिन्हें हमसे शिकायत हो। यदि हम इन सूचियों को 1930 और 1931 में तैयार किये गये ‘आर्डर-इन-कौंसिल’ से जो 1935 के अधिनियम का अंग बन गया था, मिलान करें तो हम पायेंगे कि बहुत-सी जातियों को छोड़ दिया गया है। लोक सेवा आयोग ने एक और अधिसूचना जारी की है। दिल्ली में अनुसूचित जातियों की सूची में कम से कम 64 प्रविष्टियां हैं, जबकि इस अनुसूची में केवल 39 हैं। यह अंतर क्यों हैं और इन जातियों को क्यों छोड़ा गया है? मैं माननीय मंत्री के उत्तर देने तक प्रतीक्षा करने के लिए तैयार हूँ। पर अन्तर बहुत ज्यादा है और मैं नहीं मानता कि इसका क्या आधार है। मैं अपने माननीय मित्र से अनुरोध करूंगा कि वे इस विधेयक को पारित कराने की इतनी जल्दी न करें। कैबिनेट मंत्रियों की यही चिंता है। वे तो पांच या दस मिनट सभी कुछ कर लेना चाहते हैं मानों वे ही सब कुछ समझते हैं और दूसरे लोगों का यहां कोई योगदान नहीं है हालांकि वे भी लोगों के प्रतिनिधि हैं। यह दृष्टिकोण मुझे कतई पसन्द नहीं है। मैं आशा करता हूँ कि डॉ. अम्बेडकर हमें ध्यानपूर्वक सुनेंगे और मैं उनसे उन लोगों की ओर से आग्रह करूंगा जिन्हें अपने अधिकारों के बारे में और इस सभा में क्या हो रहा है उसके बारे में कोई जानकारी नहीं है, कि वे इस मामले में जल्दबाजी से काम न लें। मैं चाहता हूँ कि इस विधेयक पर विचार करते समय हम इस मामले पर समग्र रूप से विचार करें और इसे हमेशा के लिए निपटा दें।

श्री सोनावाने ने ठीक ही कहा कि आजकल बहुत से लोग अपने घरों को छोड़कर जा रहे हैं और देश की आबादी बड़े पैमाने पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रही है। मध्य प्रदेश से बहुत से लोग यहां दिल्ली में आकर बस गये हैं। उदाहरण के लिए यदि आप महारों और कुछ अन्य अनुसूचित जातियों को जो यहां आकर स्थायी रूप से बस गई हैं, यहां की सूचियों में शामिल नहीं करेंगे तो वे जातियां अपने अधिकारों से वंचित रह जायेंगी। इन सब बातों की जांच करनी होगी, क्योंकि यह कोई अस्थायी चीज नहीं है। यह तो अन्त में संविधान का अंग बनेगी। यह तो एक स्थायी व्यवस्था है, जो हमें उम्मीद है कई साल चलेगी। इन परिस्थितियों में इस विधेयक पर विचार करने में यदि कुछ और दिन लग जाते हैं, तो वह समय की बर्बादी नहीं होगी_ वह समय का सुदपयोग होगा। अतः इस विधेयक को पारित करने के लिए कोई जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। केवल इस विधेयक को ही पास करके हम बहुत आगे नहीं बढ़ जायेंगे।

अभी बहुत-सी कठिनाइयां हैं। इसलिए मुझे सन्देह है कि हम अगले नवम्बर या दिसम्बर में चुनाव करा सकेंगे या नहीं, क्योंकि परिसीमन कार्य बड़ा भारी सरदर्द होगा। निर्वाचन आयुक्त जो करेंगे और परिसीमन समितियों ने जो निर्णय लिया है, उसमें भारी