398 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री सोनावनेः मेरे व्यवस्था के प्रश्न पर विनिर्णय नहीं दिया गया है।
माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य अपना भाषण जारी रख सकते हैं।
श्री आर. वेलायुधनः मैं किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता। परन्तु मैं यह अवश्य कहूंगा कि माननीय डॉ. अम्बेडकर ने, जो यह विधेयक लाये हैं और सब राजनीतिक संतों में महानतम गांधीजी ने, जिन्होंने असंख्य पद्दलित और अनुसूचित जातियों के लोगों की महानतम सेवा की है, इस देश के लोगों के दिलों में अपना स्थान बना लिया है। इसलिए मेरे विचार में कुछ माननीय सदस्यों ने किसी ऐसे नेता पर कीचड़ उछालकर, जिसके इस समय भी अनुसूचित जातियों में सबसे अधिक अनुयायी हैं, कोई अच्छा काम नहीं किया।
जहां तक इस विधेयक के उद्भव का संबंध है, मैं यह कहूंगा कि भाग-ग राज्यों में अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधित्व संबंधी उपबंध के बारे में बहुत पहले सोचा गया था। यद्यपि संविधान की रचना माननीय विधि मंत्री समेत बड़े-बड़े विधिवेत्ताओं और अधिवक्ताओं द्वारा की गई थी, तथापि यह बड़ी हैरानी की बात है कि वे लोग भाग-ग राज्यों में अनुसूचित जातियों के लिए प्रतिनिधित्व के उपबंध संविधान में शामिल करना बिल्कुल भूल गए।
इस विधेयक को, जिसके माध्यम से भाग-ग राज्यों की अनुसूचित जातियों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया जा रहा है, तैयार करने को लेकर काफी सांविधानिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और लोगों ने अपने दिलों को बहुत टटोला। यह विधेयक समुचित विधान है अथवा नहीं, इसे लेकर विवाद था और इस सदन में कल एक सदस्य तो अपना विरोध प्रकट करते हुए यहां तक कह गये कि भाग-ग राज्यों के अनुसूचित जातियों के लिए सीटों का कोई आरक्षण नहीं होना चाहिए। जहां तक मेरा प्रश्न है, मैंने तो सदैव इस बात पर विश्वास किया है और मैं अपने स्कूल के दिनों में यह कहता भी रहा हूँ कि अनुसूचित जातियां जिस अन्याय को सह रही हैं, उसके लिए सीटों का आरक्षण और अन्य प्रकार का आरक्षण कोई रामबाण नहीं है। इस बात को लेकर मेरे डॉ. अम्बेडकर के साथ भी मतभेद रहे हैं। परन्तु साथ ही जब आपने भाग-क और ख राज्यों को आरक्षण दिया, तो भाग -ग राज्यों के लोगों को, जिनका संसद में अथवा संबंधित स्थानीय निकायों में कोई प्रतिनिधि नहीं है, इससे विंंचत रखना अन्यायपूर्ण होगा।
जैसा कि डॉ. देशमुख ने कहा, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की सूचियों में, न केवल इस विधेयक में, बल्कि भाग-क और ख राज्यों के लिए राष्ट्रपति के आदेश में भी बहुत त्रुटियां हैं। मैंने इस संबंध में संविधान सभा की कार्यवाही को भी देखा है। उस समय यह कहा गया था कि 1935 के अधिनियम में तैयार की गई