34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 414

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सूचियों को ही नये संविधान के अंतर्गत चुनावों के समय स्वीकार कर लिया जायेगा। परन्तु जब राष्ट्रपति का आदेश आया, तो उसमें उस अधिनियम में शामिल बहुत-सी जातियों को छोड़ दिया गया और इस समय उसमें लगभग सभी भाग-क और ख राज्यों की थोड़ी-सी अनुसूचित जातियां और जनजातियां ही शामिल हैं। मेरे विचार में यह बिना किसी प्रयोजन के नहीं किया गया। यह जानबूझकर किया गया है, क्योंकि वे उन सभी अनुसूचित जातियों और जनजातियों को, जो 1935 के अधिनियम में थीं, शामिल कर लेते तो आरक्षित सीटों की संख्या बहुत बढ़ जाती। कुछ राज्यों में तो उदाहरणार्थ उत्तर प्रदेश में 13 लाख खटीक हैं, उन सभी को राष्ट्रपति की सूची में शामिल नहीं किया गया। यदि उन्हें शामिल किया जाता, तो उत्तर प्रदेश में 40 प्रतिशत सीटें अनुसूचित जातियों की ही होती। और यह कोई मामूली बात नहीं होती कि उन्हें भाग -क राज्य में इतनी सीटें मिल जातीं कि वे उस राज्य की राजनीति और राज्य को प्रभावित करने की स्थिति में होते। इसलिए उन्हें जानबूझकर छोड़ दिया गया, ताकि राज्य में अनुसूचित जातियों का प्रतिनिधित्व कम से कम हो। यह हालत उत्तर प्रदेश के ही कुछ अन्य राज्यों में भी हैं। परन्तु अधिकांश दक्षिण भारतीय राज्यों में ये सूचियां 1935 के अधिनियम के अनुसार फ्तैयारय् की गई हैं। इसलिए समूची सूची को नये सिरे से तैयार करना होगा और संविधान सभा में स्वर्गीय सरदार पटेल ने जो वचन दिया था कि 1935 के अधिनियम की सूची को आगामी चुनाव के लिए संसद में स्वीकार कर लिया जायेगा, उसे अवश्य पूरा किया जाना चाहिये और इस प्रकार दिवंगत नेता के साथ, राष्ट्रपिता के साथ और उन लाखों करोड़ों अनुसूचित जातियों और जनजातियों के साथ, जिन्हें जाति या समुदाय के आधार पर कुछ विशेषाधिकार मिल रहे हैं, न्याय किया जाना चाहिए।

वर्तमान व्यवस्था के अनुसार भी हम यह कर सकते हैं। उदाहरणार्थ, मैं मद्रास का रहने वाला हूँ परन्तु मैं किसी अन्य राज्य जैसे मम्बई में जाकर किसी सीट से चुनाव नहीं लड़ सकता। अतः यह संवैधानिक कठिनाई है जिसे संसद ही दूर कर सकती है। मैं ट्रावनकोर-कोचीन से आता हूँ परन्तु मैं बम्बई जाकर वहां किसी सीट से चुनाव नहीं लड़ सकता। यह मेरी जाति के साथ भेदभाव है, क्योंकि सवर्ण जातियों के लोग अपने दल के आधार पर या किसी और आधार पर भारत में कहीं भी किसी भी सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। इसलिए मेरा सरकार से ही नहीं संसद से भी यह अनुरोध है कि वह इन संवैधानिक विषमताओं को शीघ्रातिशीघ्र दूर करे। मेरा निवेदन है कि पहली सूची में से जिन जातियों के नाम निकाल दिये गये हैं, उन्हें शामिल करना होगा और एक न्यायोचित सूची तैयार करनी होगी, ताकि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को दिया गया आरक्षण न्यायोचित आधार पर हो। अन्यथा इस आरक्षण को बिल्कुल हटा दीजिये और तब हम सभी के साथ बराबरी के आधार पर चुनाव लड़ेंगे। मुझे भविष्य में बहुत आशायें हैं और मेरी जाति का भविष्य भी उज्जवल है। वे पद्दलित हैं और उन्हीं का