34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 416

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दिया गया है, मैं इसका समर्थन करता हूँ, क्योंकि जहां तक इस विधेयक का संबंध है, न तो सिद्धांत और न ही सारतः इसका विरोध किया जा सकता है।

फिर भी मैं एक या दो टिप्पणियां करना चाहूंगा। माननीय मंत्री ने जो भाषण दिया था। उसका उल्लेख कई सदस्यों द्वारा किया जा चुका है। मैं उस पर कुछ नहीं कहना चाहता। परन्तु उनकी जानकारी के लिए मैं यह बताना चाहूंगा कि जब कांग्रेस ने 1921 में दलित जातियों की अशक्तताओं को दूर करने का कार्य अपने कार्यक्रम में शामिल किया था, उससे पहले भी दिल्ली, आल इंडिया दलितोद्धार सभा का मुख्यालय थी। इस सदन की नींव स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानंद द्वारा रखी गई थी। उन्होंने ही 1920 में कांग्रेस के कार्यक्रम के कलकत्ता अधिवेशन में हरिजनों की अशक्ततायें दूर करने का काम कांग्रेस के कार्यक्रम में शामिल करने हेतु संकल्प पेश किया था। जलियांवाला बाग कांड के बाद इंडियन नैशनल कांग्रेस के अमृतसर में हुए अधिवेशन की स्वागत समिति के सभापति के रूप में दिये गये अपने अभिभाषण में उन्होंने हरिजनों की असमर्थताओं का प्रश्न उठाया था और कांग्रेस को इसका महत्व समझने के लिए राजी किया था। यदि माननीय मंत्री, जिन्होंने निस्संदेह हरिजनों के उद्धार के लिए कार्य किया है और हरिजन नेता के रूप में उनका काफी ऊंचा स्थान है, इस तथ्य को स्वीकार कर लेते, तो बहुत ही बढि़या होता। परन्तु दुर्भाग्य से उनकी नीति और उनका सोचने और समझने का तरीका बिल्कुल अलग है। यदि मुझे दिल्ली के हरिजनों के उद्धार के लिए किये गये संघर्ष के इतिहास का उल्लेख करना होता.......

माननीय अध्यक्षः मैं माननीय सदस्य का ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूँ कि तब माननीय अध्यक्ष पीठासीन थे तो उन्होंने एक विनिर्णय दिया था कि यहां किसी आरंभिक बात को छोड़कर, डॉ. अम्बेडकर के भाषण का विस्तार से उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है। अतः मैं माननीय सदस्य से अनुरोध करूंगा कि वह विधेयक के गुणावगुण पर ही बोलें।

श्री देशबंधु गुप्ताः मैंने उसका कोई उल्लेख नहीं किया है। मैं तो केवल यह बताने का प्रयास कर रहा हूँ कि सीटों के प्रस्तावित आरक्षण के बिना भी, दिल्ली एक हरिजन उम्मीदवार को चुनकर भेज सकती है। जब विधेयक संसद के समक्ष लाया जा रहा था, तब मेरे मित्र ने एक दुर्भाग्यपूर्ण भाषण दिया था, परन्तु मैंने तो उसका उल्लेख भी जानबूझकर नहीं किया। मैं तो उनको यह बताना चाहता हूँ कि क्योंकि वे बम्बई से आते हैं इसलिए वे सम्भवतः दिल्ली की परिस्थितियों से परिचित नहीं हैं। उन्होंने तो बस यही किया है कि उन्होंने दिल्ली की पूरी आबादी को हरिजन मानने का प्रयास किया है। उनका दिल्ली की सांविधानिक प्रगति में केवल यही योगदान है। इसके लिए वे अपने आपको बधाई दे सकते हैं, क्योंकि इसी तरह वे बराबरी ला सकते हैं। हरिजनों का दर्जा बढ़ाने के बजाए उन्होंने गैर-हरिजनों का दर्जा घटाने का प्रयास किया है और इस प्रकार