34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 417

402 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दोनों को एक ही राजनीतिक स्तर पर लाकर खड़ा कर दिया है। मैं उन्हें यह समझाना चाहता हूँ कि दिल्ली में 1921 में और उससे भी पहले विदेशी सरकार जिस पर वे आजकल इतने मोहित हो रहे हैं, हरिजनों का देश के सर्वोत्तम हितों के विरुद्ध प्रयोग कर रही थी और उनका शोषण भी करा रही थी। सितम्बर, 1921 में पीपुल्स पार्क में दलित जातियों का एक विशाल अखिल भारतीय सम्मेलन उन दिनों प्रिस ऑफ वेल्स का स्वागत करने के लिए समर्थन जुटाने के लिए हुआ था, जब सारा देश इसके खिलाफ था। दलित जातियों के नेताओं के इस रवैये के बावजूद, स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानंद द्वारा हरिजनों के उद्धार के लिए आरम्भ किया गया। आन्दोलन जारी रहा, क्योंकि वे महसूस करते थे कि हरिजनों की आवश्क्तताओं को दूर करना उनका कर्त्तव्य है और यह हरिजनों पर कोई एहसान नहीं है। दिल्ली में स्वामी श्रद्धानंद पर पुरानी अंग्रेज सरकार के समर्थकों द्वारा हमला किया गया था। इनमें वे लोग भी थे जो मेरे माननीय मित्र के साथ उस समय थे, जब वे हरिजनों के मंदिरों में और कुओं आदि पर जाने के लिए एक जुलूस का नेतृत्व कर रहे थे। यह सब इतिहास बन चुका है जिसे भूला नहीं जाना चाहिए। अतः मैं इसे एक सम्मान की बात समझता यदि दिल्ली को इस विधेयक में शामिल नहीं किया जाता और उसे एक हरिजन को बिना आरक्षण के चुनकर भेजने का अवसर दिया जाता। इससे यह भी साबित हो जाता है कि दस साल बाद जब आरक्षण नहीं होगा, तो हरिजन उम्मीदवारों को चुनाव जीतने में कोई कठिनाई नहीं होगी। इन शब्दों के साथ मैं विधेयक का समर्थन करता हूँ। मैं अपने माननीय मित्र को यह आश्वासन देना चाहता हूँ कि यह विधेयक हो या न हो, दिल्ली को बराबर का दर्जा प्राप्त है। वे जिन अशक्तताओं के बारे में शिकायत कर रहे हैं, वे देश के उस भाग में होंगी जहां से वे चुनकर आते हैं। जहां तक इन क्षेत्रों का संबंध है, स्वामी श्रद्धानंद और स्वर्गीय लाला लाजपतराय जैसे समाज सुधारकों और अन्य आर्यसमाजी नेताओं ने जो सामाजिक कार्य किया है, उसके पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है। उन्होंने इस पर अपना जीवन बलिदान कर दिया और इस विधेयक को पारित करते समय इस तथ्य को स्वीकार किया जाना चाहिये।

श्री द्विवेदीः जहां तक इस विधेयक के सिद्धांतों का संबंध है, मैं इसका समर्थन करता हूँ क्योंकि मैंने इस सदन में कई बार सुझाव दिये हैं कि भाग-ग राज्यों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व के लिए उपबंध किया जाये। मैं यह कहना चाहता हूँ कि जहां तक भाग-ग राज्यों के प्रशासन और विकास का संबंध है वह मुद्दा इस सभा में हम विधेयक को पेश करने से पहले उठाया जाना चाहिये था। परन्तु इस विधेयक के महत्व को समझे बिना सरकार जल्दबाजी में इस विधेयक को ले आई। इससे यह सिद्ध होता है कि सरकार लोक-प्रतिनिधित्व और एक लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना करने के लिए आवश्यक सुधार लाने के बारे में इतनी उत्सुक नहीं है, जितना इस विधेयक के बारे में। फिर भी मैं इस विधेयक का समर्थन करूंगा। परन्तु साथ ही मैं यहां एक-दो बातें और कहना चाहूंगा। सबसे पहले मैं कहना चाहूंगा,