34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 418

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जैसाकि दिल्ली के बारे में पूर्व वक्ता श्री देशबंधु गुप्ता ने कहा, कि हम इस विधेयक के बिना भी हरिजन प्रतिनिधि को चुनाव जिता देते। तभी यह कहा जा सकता है कि हम हरिजनों के साथ कितनी उदारता का व्यवहार करते हैं। विन्ध्य प्रदेश में कांग्रेस और सार्वजनिक कार्यकर्ता हरिजनों और सवर्ण हिन्दुओं के साथ एक जैसा व्यवहार करते हैं और जैसा कि श्री देशबंधु गुप्ता ने कहा, दिल्ली में उन्हें प्रतिनिधित्व के अवसर पहले ही दिये चुके हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि विन्ध्य प्रदेश में अस्पृश्यता स्कूलों में तथा रोजमर्रा के व्यवहार में समाप्त कर दी गई है और वहां हरिजनों को सभी समान रूप से प्यार करते हैं और उन्हें उचित प्रतिनिधित्व भी प्राप्त है। उनके लिए अब एक नया विधान अधिनियमित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। अब चूंकि यह विधेयक हमारे समक्ष आ गया है, मैं इसका स्वागत करता हूँ, परन्तु मैं इस संबंध में कुछ बातें भी कहना चाहता हूँ। सबसे पहले तो बात यह है कि लोक सभा में विन्ध्य प्रदेश के लोग इतने अनपढ़ और पिछड़े हुए हैं कि वहां ऐसे लोग बहुत कम मिलेंगे, जो संसद में अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन कर सकें और लोगों का समुचित रूप से प्रतिनिधित्व कर सकें। ऐसा हरिजनों के मामले में ही नहीं है, सवर्ण हिन्दू भी निरक्षरता के शिकार हैं। श्री ठक्कर ने एक बार कहा था कि वयस्क मताधिकार देने से पहले लोगों को साक्षर बनाया जाना चाहिये था। हमने शिक्षा के बारे में कभी कोई प्रश्न नहीं उठाया। दिल्ली में जबकि नये स्कूल खोले गये हैं और उनकी शिक्षा की व्यवस्था की गई है और गांवों में भी शिक्षा-सुविधायें प्रदान की गई हैं, विन्ध्य प्रदेश में इस बारे में कोई कदम नहीं उठाये गये हैं। मेरे एक पूर्व वक्ता, श्री सोनावने ने इस विधेयक का भारी समर्थन किया। मैं भी उनके साथ सहमत हूँ। मैं जानना चाहता हूँ कि क्या उन्होंने अपने भाषण में कहीं भी अनुसचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों की शिक्षा की व्यवस्था के अभाव का उल्लेख किया? वे आजकल आधुनिक जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं और सुविधाओं से भी वंचित हैं। खेरुआ जैसे स्थान पर एक गरीब मजदूर को चार आने प्रति दिन के हिसाब से मजदूरी दी जाती है जबकि ठेकेदारों को इसकी लगभग दुगुनी दर पर ठेका दिया जाता है। अतः बेहतर यह होता कि वे माननीय सदस्य, जो हरिजनों की हिमायत लेते हैं स्वयं उन स्थानों पर जाते, उनकी दशा सुधारने के कोई ठोस उपाय करते और सरकार के शिक्षा विभाग से कहते कि वह हरिजनों को शिक्षा-सुविधाएं प्रदान करने की व्यवस्था करे। वास्तव में वे अपने हितों में अधिक रुचि रखते हैं, वे यहां उनके प्रतिनिधि के रूप में चुन कर आना चाहते हैं और वे हरिजनों के हितों की परवाह नहीं करते। जब तब वे हरिजनों की भलाई के लिए ठोस काम नहीं करेंगे, तब तक उनकी

ख्याली बातें उनके व्यर्थ का आलाप हैं, जिसे मैं पसन्द नहीं करता, क्योंकि इससे देश का कोई भला नहीं होगा। हमें अनुसूचित जातियों के लोगों में शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि जब वे संसद में चुन कर आयें, तो यहां अपना कर्त्तव्य ठीक से निभा सकें, वर्ना उन्हें चुनने से कोई लाभ नहीं होगा।