406 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
विधान की व्यवस्था है तो वह विधान तो पहले ही अधिनियमित हो चुका है और यदि ऐसी व्यवस्था नहीं है तो संविधान में यह कहीं नहीं कहा गया है कि ऐसा विधान लाया जाना चाहिये। इसलिए जैसा कि मुझसे पहले बोलने वाले सदस्य ने कहा है, यह विधेयक फ्अनावश्यक हैय्। इसलिए माननीय मंत्री से मेरा अनुरोध है कि वह इस कानूनी पेचीदगी की ओर ध्यान दें, ताकि बाद में इसे लेकर उच्चतम न्यायालय में कोई कानूनी झगड़ा न हो। माननीय मंत्री एक जाने-माने कानूनी विशेषज्ञ हैं और इसीलिए वह इस बात को बेहतर समझ सकते हैं कि इस विधेयक में कानूनी पेचीदगियां हैं। मैं आशा करता हूं कि वह इस विषय पर प्रकाश डालें और यदि आवश्यक हो तो इस विधेयक में तदनुसार संशोधन करें या इस पर विचार करने के बाद इसे वापस ले लें, क्योंकि जैसा कि श्री देशबंधु गुप्ता ने कहा है और विन्ध्य प्रदेश के प्रतिनिधि ने भी इसका समर्थन किया है। ऐसी कोई शर्त नजर नहीं आती कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को तभी प्रतिनिधित्व मिलेगा जब इस प्रकार का विधान अधिनियमित हो जायेगा। उन्हें प्रतिनिधित्व इस प्रकार के विधान के बिना भी मिल जायेगा। वर्तमान विधेयक में अन्तर्ग्रस्त कानूनी पेचीदगियों की ओर सदन का ध्यान दिलाना मेरा कर्त्तव्य है।
दूसरी बात यह है कि माननीय मंत्री संविधान के अनुच्छेद 82 का सहारा ले सकते हैं, जो इस प्रकार हैः
फ्अनुच्छेद 81 के खंड (1) में किसी बात के होते हुए भी, संसद, विधि द्वारा, पहली अनुसूची के भाग-क में विनिर्दिष्ट किसी राज्य के या किसी ऐसे राज्य-क्षेत्र के, जो भारत के राज्य-क्षेत्र में तो हो, परन्तु किसी राज्य में उक्त खंड में उपबन्धित आधार या रीति के सिवाय किसी अन्य आधार पर या रीति से सम्मिलित न हो, लोक सदन में प्रतिनिधित्व के लिए उपबंध कर सकेगी।य्
संसद को उपयुक्त अनुच्छेद के अन्तर्गत ऐसा विधान अधिनियमित करने का अधिकार है और उसने अनुच्छेद 330 का खंड 2 पहले ही अधिनियमित कर रखा है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को राष्ट्रपति द्वारा आबंटित सीटों की संख्या जनसंख्या के अनुपात में होगी। इन परिस्थितियों में ऐसे किसी विधेयक की आवश्यकता नहीं थी। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस कानूनी पेचीदगी को दूर किया जाये। जहां तक मैं समझता हूँ, माननीय मंत्री ने इस आशय की कोई बात नहीं कही है और इसीलिये मैंने सदन का ध्यान इस मुद्दे की ओर दिलाया है।
इसके अतिरिक्त, मैं माननीय मंत्री का ध्यान इस तथ्य की ओर भी दिलाना चाहता हूँ कि जब लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम यहां पेश किया गया था, तो विन्ध्य प्रदेश की जनसंख्या लगभग 3 लाख थी। इसमें अन्तःक्षेत्र विलय अधिनियम के अनुसार सीमावर्ती क्षेत्रों में ढाई लाख से तीन लाख की जनसंख्या और शामिल हो गई। उस समय यह तय हुआ कि विन्ध्य