34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 422

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प्रदेश को छह सीटें आबंटित की जाएँगी। अब जनगणना हो चुकी है। मुझे बताया गया है कि विन्ध्य प्रदेश की जसंख्या में पांच लाख की बढ़ोतरी हो गई है। इन परिस्थितियों में विन्ध्य प्रदेश को और सीटें आबंटित की जानी चाहिए। इसलिए मैं यह महत्वपूर्ण सुझाव देना चाहूंगा कि पहले हमें यह सोचना चाहिये कि ये दो सीटें कैसे आबंटित की जायें। यदि इस संबंध में निर्णय विन्ध्य प्रदेश की परिसीमन समिति से परामर्श करके लिया जाये तो बेहतर होगा। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि विन्ध्य प्रदेश की आबादी में पांच लाख की वृद्धि हो गई है। इसलिए इन आबंटित सीटों की संख्या के अनुसार लोक प्रतिनिधित्व विधेयक में संशोधन करके एक और सीट के वृद्धि की जानी चाहिए।

इन शब्दों के साथ, मैं इस विधेयक का समर्थन करता हूँ।

डॉ. परमार (हिमाचल प्रदेश)ः मैं इस विधेयक का समर्थन करने की नहीं बल्कि सरकार को भाग-ग राज्यों में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए बधाई देने के लिए खड़ा हुआ हूँ। इस सदन में यह कहा गया है कि विधि मंत्री इस विधेयक को बेकार और कुछ अन्य बाह्य कारणों से लेकर आये हैं। मैं इससे बिल्कुल समहत नहीं हूँ और मैं यह बताना चाहता हूँ कि इस विधेयक को लाकर विधि मंत्री और भारत सरकार ने जो किया है वह संविधान में निर्धारित नीति का ही कार्यान्वयन है।

इस मामले में दिल्ली और विन्ध्य प्रदेश के मेरे मित्रों की भावनाएं जो भी होंµऔर उनकी भावना यह है कि इस विधेयक के बिना भी अनुसूचित जातियों और जनजातियों का लोक सभा में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकता है। मैं किन्हीं निश्चित कारणों से इस विधेयक का स्वागत करता हूँ। मैं हिमाचल प्रदेश के विषय में कुछ जानकारी रखता हूँ और उसके आधार पर कह सकता हूँ कि केन्द्रीय सरकार और अन्य राज्य सरकारों ने जो कुछ किया है उसके बावजूद हमारा तंत्र इतनी धीमी गति से चल रहा है कि अनुसूचित जातियों में उस उत्साह का अभाव है जो संविधान के साथ आना चाहिए था। अतः हमें उन्हें यह समझाना चाहिए कि हम यह सुनिश्चित करने के लिए दृढ़संकल्प हैं कि अनुसूचित जातियों के साथ आगामी चुनावों में समुचित न्याय किया जायेगा। हिमाचल प्रदेश में जो हो रहा है उसे देखते हुए यह और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।

मैं सदन का अधिक समय नहीं लेना चाहता। परन्तु मैं यह सिद्ध करने के लिए कि यह विधेयक कितना जरूरी है, एक या दो घटनाओं का जिक्र करूंगा। लगभग चार महीने पहले 4 जनवरी, 1951 को हिमाचल प्रदेश सलाहकार परिषद ने सरकार से सिफारिश की थी कि अस्पृश्यता उन्मूलन अधिनियम को, जैसा कि यह उत्तर प्रदेश में प्रवृत्त हैµहिमाचल प्रदेश में भी लागू कर दें क्योंकि उन क्षेत्रों की अनुसूचित जातियां बहुत ही अशक्तताओं से पीडि़त हैं। राज्य सरकार के किन्हीं लोगों से यह जानकर मुझे