34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 423

408 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बड़ी हैरानी हुई कि उनमें से कुछ यह सोचते हैं कि इस विधेयक की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि वहां ऐसी कोई समस्या नहीं है जैसी कि मद्रास में है और न ही लोग इसकी मांग कर रहे हैं कि उक्त अधिनियम को हिमाचल प्रदेश में लागू किया जाये। यदि केन्द्रीय सरकार का भी ऐसा ही विचार है तो मुझे खेद है कि काफी कुछ जो करना बाकी है, वह नहीं हो पायेगा।

जब हाल ही में मैं अपने निर्वाचन-क्षेत्र गया, तो अनुसूचित जातियों के कुछ लोग, जो कोली के नाम से जाने जाते हैं, वहां हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमूर में मुझे मिले। उन्होंने मुझे एक घटना सुनाई कि उस जाति के कुछ लोगों ने अपनी कल्याण संबंधी कुछ समस्याओं पर विचार करने के लिए एकत्र होने का प्रयास किया। वहां के भूस्वामियों ने उन पर हमला किया, उनके हाथ-पैर बांध दिये और लगभग तीन दिन तक उन्हें बन्दी बना कर रखा। यदि नये संविधान के अन्तर्गत अनुसूचित जातियों के साथ यही सब होना है तो मुझे खेद है कि हमें इस मामले पर बहुत गम्भीरता से विचार करना होगा। हमें इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि हमारा तंत्र नये विचार करने के लिए अपने को अभी तक तैयार नहीं कर सका है। वे अभी तक पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं और चूंकि समूची सेवाओं में से एक में भी अनुसूचित जाति को प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, ऐसी घटनाएं हो रही हैं। मुझे इस घटना के बारे में उन्हीं लोगों ने नहीं बताया, जिनके साथ यह घटना हुई है बल्कि उन लोगों ने भी बताया जिन्होंने पुलिस और स्थानीय कांग्रेस समिति के साथ सम्पर्क किया जिसने इस मामले को अपने हाथ में लिया ताकि इन लोगों के साथ न्याय हो सके। परन्तु पुलिस यह महसूस करती है कि वह अपराधियों को नहीं पकड़ सकेगी क्योंकि कोई सबूत सामने नहीं आ रहा है क्योंकि उन अनुसूचित जाति के लोगों को जो काश्तकार हैं, यह कहा गया है कि यदि वे भूस्वामियों के खिलाफ गवाही देंगे तो वे कहीं के नहीं रहेंगे और उनकी जमीनें छीन ली जायेंगी। इसीलिए उन्हें अब प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए ताकि उनमें से एक को यहां आकर वस्तु-स्थिति बताने का मौका मिल सके। इससे उन लोगों पर प्रतिक्रिया होगी जो नहीं बदले हैं और जो वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से यह महसूस करता हूँ कि जब तक हम इस समस्या को हल नहीं करेंगे और भाई-चारे की भावना में हल नहीं करेंगे, तब तक भेदभाव को समाप्त नहीं करेंगे तब तक हमारा सामाजिक ढांचा नहीं सुधरेगा और यह छिन्न-भिन्न हो जायेगा। मैं व्यक्तिगत रूप से महसूस करता हूँ कि यह विधेयक ठीक समय पर लाया गया है।

श्री पी.वाई. देशपांडे (मध्य प्रदेश)ः मैं माननीय विधि मंत्री का और सदन का ध्यान ऐसे कानूनी पहलुओं की ओर दिलाना चाहता हूँ जिनकी ओर अभी तक ध्यान नहीं गया है। इस विधेयक में 1950 के लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम को संशोधित करने का प्रस्ताव है और यह अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से लाया गया है। मेरा निवेदन यह है कि यह व्यवस्था लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950