34. लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) विधेयक - Page 424

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में पहले ही मौजूद है। अधिनियम की धारा 3 में, जिसमें संशोधन किया जा रहा है, लोक सभा में सीटों के आबंटन की व्यवस्था है, जिसकी उप-धारा (2) में कहा गया है कि फ्पहली अनुसूची के प्रथम स्तम्भ में उल्लिखित प्रत्येक राज्य को उस राज्य के सामने उसके दूसरे स्तम्भ में उल्लिखित सीटें आबंटित की जायेंगी।य् पहली अनुसूची में भाग-ग राज्यों को भी सीटें आबंटित की गई हैं। प्रश्न उठता है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की क्या स्थिति है? उसकी भी व्यवस्था की गई है। अधिनियम की धारा 6, उप-धारा (2 में कहा गया है, फ्इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशीघ्र राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र में अनुसूचित जातियों अथवा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों, यदि कोई हों की संख्या (क)...........(ख)............., (ग).......... और (घ)............. निर्धारित करेगा।य् यह धारा राष्ट्रपति को अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए भी आरक्षण निर्धारित करने का अधिकार देती है। इसलिए मुझे लगता है कि यह विधेयक एकदम अनावश्यक है। संविधान के अनुच्छेद 330 में व्यवस्था की गई है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1930 तो सांविधानिक निदेश का पालन ही करता है और भाग-ग राज्यों के लिए सीटों का उपबंध करता है और अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व की भी व्यवस्था करता है। अतः मुझे लगता है कि केवल एक बात को सन्देह में छोड़ दिया गया है। और वह यह है कि उन विशेष जातियों और जनजातियों के नामों का उल्लेख नहीं किया गया है, जिन्हें अनुसूचित जातियां और जनजातियां कहलाने का हक होगा। यह संविधान के अनुच्छेद 330 और 392 के अधीन ही नहीं बल्कि अधिनियम की धारा 6 के अंतर्गत भी जिसे इस विधेयक द्वारा संशोधित किया जा रहा है, किया जा सकता था। जैसा कि भाग-क और ख राज्यों के बारे में किया गया है। यद्यपि मैं तहेदिल से इस विधेयक के उद्देश्य के साथ सहमत हूँ। मैं यह भी चाहता हूँ कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए और उनके प्रतिनिधित्व के संबंध में सभी सन्देह दूर किए जाने चाहिए। मुझे ऐसा लगता है कि जब इन जातियों और जनजातियों के नामों का उल्लेख करने वाले राष्ट्रपति के आदेश से काम चल सकता है, और अब ऐसा आदेश संसद के समक्ष लाया जा सकता था और जैसा कि भाग-क और

ख राज्यों के सबंध में हुआ, उनमें भी संसद द्वारा संशोधन परिवर्तन अथवा उपांतरण किया जा सकता था। इससे उन राज्यों के लोगोंको संशोधनों के सुझाव देने, राष्ट्रपति के आदेश में उल्लिखित जातियों और जनजातियों में और नाम जोड़ने या हटाने के लिए अधिकार दिया जा सकता था तो फिर इस विधेयक को लाने की क्या आवश्यकता थी? जो इस विधेयक के माध्यम से करने का प्रयास किया जा रहा है, वह राष्ट्रपति के एक आदेश द्वारा, जिसमें जातियों और जनजातियों के नाम होते, और उस आदेश को सभा के समक्ष रखकर और फिर बाद में वही प्रक्रिया अपनाकर जो भाग क और ख राज्यों के संबंध में अपनाई गई थी, किया जा सकता था। मैं आशा करता हूँ कि विधि मंत्री इस पर विचार करेंगे और हमें यह समझायेंगे कि यह विधेयक क्यों आवश्यक है।